स्वामी विवेकानंद से अहिल्याबाई होलकर तक
सोमनाथ केवल एक कालखंड की कथा नहीं है। देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपने प्रयासों से यहां पूजा-पाठ की परंपरा को जीवित रखा। 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद जब यहां पहुंचे, तो यह स्थल उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। उन्होंने कहा था कि सोमनाथ जैसे मंदिर किसी भी पुस्तक से अधिक हमारी सभ्यता को समझाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग में स्पष्ट किया है कि सोमनाथ की कहानी विध्वंस की नहीं, बल्कि पिछले 1000 वर्षों से चले आ रहे भारतीय स्वाभिमान, आस्था और पुनर्निर्माण की गाथा है। महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन भारत की आत्मा को नहीं जीत सका। आज 2026 में भी सोमनाथ खड़ा है, यह संदेश देते हुए कि नष्ट करने की मानसिकता रखने वाले इतिहास में सिमट जाते हैं, जबकि आस्था पर खड़ी सभ्यताएं युगों तक जीवित रहती हैं।
प्रधानमंत्री ने इस प्रसंग को आधुनिक भारत से जोड़ते हुए लिखा है कि यही सभ्यतागत मूल्य आज भारत को वैश्विक मंच पर आशा का केंद्र बना रहे हैं। योग, आयुर्वेद, कला, संस्कृति और नवाचार—सब इसी चेतना से उपजे हैं।
सोमनाथ हमें सिखाता है कि यदि एक हजार वर्ष पहले खंडित हुआ मंदिर फिर से अपने वैभव के साथ खड़ा हो सकता है, तो भारत भी अपने प्राचीन गौरव के साथ एक विकसित राष्ट्र बन सकता है। सोमनाथ आज भी आशा का नाद है, विश्वास का स्वर है और उस शक्ति का प्रतीक है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देती है।