
केरल। केरल के पूर्व परिवहन मंत्री और विधायक एंटनी राजू को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केरल हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया और 1990 में जूनियर वकील के तौर पर उनके द्वारा चलाए गए ड्रग्स मामले में “अंडरवियर” के रूप में कथित तौर पर सबूतों से छेड़छाड़ से संबंधित उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को बहाल कर दिया। यह एक ऐसा मामला था, जिसमें 1990 में एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक के अंडरवियर में चरस छिपाकर रखा गया था।
जस्टिस सीटी रविकुमार और संजय करोल की पीठ ने कहा कि केरल हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि आपराधिक कार्यवाही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1)(बी) के कारण वर्जित है। सुप्रीम कोर्ट ने राजू के खिलाफ आरोपपत्र पर संज्ञान लेने वाले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को बहाल कर दिया। यह देखते हुए कि मामला तीन दशक पुराना था, सुप्रीम कोर्ट बेंच ने आदेश दिया कि एक साल के भीतर मुकदमा पूरा किया जाए।
कोर्ट ने यह भी माना कि केरल हाई कोर्ट ने राजू के खिलाफ नए सिरे से जांच शुरू करने का आदेश देकर कोई गलती नहीं की थी। इसने यह तर्क भी खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता एमआर अजयन के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का कोई अधिकार नहीं था। राजू जनाधिपत्य केरल कांग्रेस के नेता थे, जो केरल में सत्तारूढ़ एलडीएफ का एक घटक है। वह पिछले साल 23 दिसंबर तक परिवहन मंत्री थे।
सितंबर 1990 में एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक से ड्रग्स (चरस) जब्त की गई थी, जिसे उसके अंडरवियर की जेब में छिपाया गया था। अंडरवियर एक महत्वपूर्ण सबूत था और बाद में उसे आरोपी को लौटा दिया गया क्योंकि इसे उसका निजी सामान माना जाता था। राजू, एक जूनियर वकील के रूप में, उस समय ऑस्ट्रेलियाई नागरिक का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और उन्होंने अंडरवियर लिया था।
ऑस्ट्रेलियाई नागरिक को शुरू में NDPS एक्ट के तहत सत्र न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया था, लेकिन केरल उच्च न्यायालय ने उसे यह कहते हुए बरी कर दिया कि अंडरवियर आरोपी को फिट नहीं था। बचाव पक्ष के इस तर्क की पुष्टि करने के लिए कि अंडरवियर आरोपी के लिए बहुत छोटा था, उच्च न्यायालय ने एक शारीरिक परीक्षण भी किया। बहस के दौरान यह भी प्रस्तावित किया गया कि अंडरवियर कई बार धोने और इस्त्री करने के कारण सिकुड़ गया होगा।
हालांकि उच्च न्यायालय ने आरोपी को बरी कर दिया, लेकिन उसने सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना को स्वीकार किया और सतर्कता जांच का आदेश दिया। इसके बाद 1994 में एक FIR दर्ज की गई। जांच के बाद लास्ट चार्ज शीट दाखिल की गई, जिसमें राजू और एक अदालत के कर्मचारी को मामले में आरोपी बनाया गया, जिसमें साजिश और भौतिक साक्ष्यों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया। अंतिम रिपोर्ट में राजू और अदालत के कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र), 420 (धोखाधड़ी), 201 (साक्ष्य नष्ट करना), 193 (झूठे साक्ष्य के लिए सजा) और 217 (लोक सेवक की अवज्ञा) के साथ धारा 34 (आपराधिक इरादा) के तहत दंडनीय अपराधों की सूची दी गई है।
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