
राजनीति में अक्सर बड़े काफिले, सुरक्षा घेरा और प्रोटोकॉल चर्चा का विषय बनते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार एक अलग कार्यशैली की मिसाल पेश कर रहे हैं। बुधवार को उन्होंने फिर ऐसा कदम उठाया, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों तक का ध्यान खींच लिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर से उज्जैन तक की यात्रा सरकारी काफिले की बजाय बस से की। उनके साथ मंत्री, सांसद और कई जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री का यह कदम सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि सादगी, मितव्ययता और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का सार्वजनिक संदेश माना जा रहा है।
28 मई को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर से उज्जैन जाने के दौरान अपना पारंपरिक काफिला छोड़ दिया। उन्होंने एक सामान्य बस से सफर किया, जिसमें मंत्री तुलसीराम सिलावट, सांसद शंकर लालवानी और अन्य वरिष्ठ जनप्रतिनिधि भी उनके साथ शामिल हुए। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से मितव्ययता और संसाधनों के संतुलित उपयोग की अपील की है। उसी संदेश को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने स्वयं बस से यात्रा करने का फैसला लिया। मुख्यमंत्री ने कहा, “आज मैं स्वयं लोकल वाहन से इंदौर से उज्जैन जा रहा हूं। हम सभी प्रयास कर रहे हैं कि वैश्विक संकट के इस दौर में संसाधनों का मितव्ययता से उपयोग हो। यही समय की जरूरत है।”
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डॉ. मोहन यादव पिछले कुछ समय से प्रशासनिक खर्चों में संयम और सादगीपूर्ण कार्यशैली को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका यह कदम आम जनता के बीच सकारात्मक संदेश देने की कोशिश है। सरकारी स्तर पर ईंधन बचत, अनावश्यक खर्चों में कमी और संसाधनों के बेहतर उपयोग को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री का बस से सफर करना प्रतीकात्मक रूप से बड़ा संदेश माना जा रहा है।
यह पहला मौका नहीं है जब मुख्यमंत्री ने इस तरह की पहल की हो। इससे पहले सिंगरौली दौरे के दौरान भी उन्होंने टूरिस्ट बस से कार्यक्रम स्थल तक यात्रा की थी। उस समय भी उनके साथ लंबा काफिला नहीं था। मुख्यमंत्री ने तब कहा था कि किसी जनप्रतिनिधि की पहचान उसके प्रोटोकॉल से नहीं, बल्कि जनता के प्रेम और सेवा से होती है। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा में रहा था।
मुख्यमंत्री ने लोगों से भी अपील की कि वे संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करें। उनका कहना था कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ईंधन और सरकारी संसाधनों की बचत बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की पहल लगातार जारी रहती है, तो इससे सरकारी खर्चों में कमी के साथ-साथ जनता में भी जागरूकता बढ़ सकती है।
भारतीय राजनीति में वीआईपी कल्चर को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में किसी मुख्यमंत्री का सार्वजनिक रूप से काफिला छोड़ बस में सफर करना आमतौर पर देखने को नहीं मिलता। यही वजह है कि डॉ. मोहन यादव की यह यात्रा सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखी जा रही है। खासकर ऐसे समय में, जब सरकारें खर्चों में संतुलन और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की बात कर रही हैं। मुख्यमंत्री की यह पहल आने वाले समय में प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की दिशा में एक संकेत मानी जा सकती है।
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