
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मध्य प्रदेश में भारतीय कालगणना और आधुनिक तकनीक के मेल की एक खास पहल सामने आई है। मुख्यमंत्री निवास में आयोजित विशेष कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 के वॉल वर्जन का लोकार्पण किया।
मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के अंतर्गत श्रीकृष्ण पाथेय न्यास की ओर से आयोजित कार्यक्रम में लॉन्च की गई इस घड़ी में बेहद लंबी अवधि की पंचांगीय गणनाओं को देखने की सुविधा दी गई है। इसके जरिए करीब 21 लाख वर्ष पूर्व तक की पंचांगीय गणनाओं का अध्ययन किया जा सकता है, जबकि लगभग 5 लाख वर्ष आगे तक की कालगणना भी देखी जा सकेगी।
विक्रमादित्य वैदिक घड़ी के पहले संस्करण को और विकसित करने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव की भी भूमिका रही है। हाल ही में काशी विश्वनाथ मंदिर में वैदिक घड़ी का अवलोकन करते समय प्रधानमंत्री ने इसमें प्राचीन काल की गणनाओं को शामिल करने और इसे और अधिक परिष्कृत करने का सुझाव दिया था। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 विकसित की गई है।
कार्यक्रम में बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में तैयार की गई यह घड़ी भारतीय कालगणना के नजरिए से त्रेतायुग, द्वापरयुग से लेकर वर्तमान समय तक के विशाल कालखंड को समझने का प्रयास करती है। इस मौके पर मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति सलाहकार श्रीराम तिवारी और वैदिक क्लॉक रिस्ट वॉच के अन्वेषणकर्ता मयंक पाटीदार ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को वैदिक रिस्ट वॉच भी भेंट की।
मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति सलाहकार श्रीराम तिवारी ने बताया कि विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 भारतीय वैदिक कालगणना, पंचांग, ज्योतिषीय गणित और खगोलीय घटनाओं को डिजिटल तकनीक के जरिए एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने का प्रयास है। इसमें करीब 19 प्रमुख वैदिक और पंचांगीय तत्वों को शामिल किया गया है। यूजर्स इसमें वैदिक समय के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण जानकारियां देख सकते हैं।
घड़ी में मुहूर्त, कला, काष्ठा, सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय, चंद्रास्त, सूर्य राशि, चंद्र राशि, तिथि, पक्ष, हिंदू मास, नक्षत्र, योग, करण और चौघड़िया जैसी जानकारी उपलब्ध होगी। इसके अलावा प्रमुख हिंदू त्योहारों और व्रतों की जानकारी भी इसमें दी गई है। खास बात यह है कि पंचांग की कुछ जटिल गणनाओं को भी सिस्टम में शामिल किया गया है। इसमें वृद्धि तिथि, अधिक मास और क्षय मास जैसी गणनाएं शामिल हैं।
विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी लंबी अवधि की कालगणना क्षमता बताई गई है। इसके जरिए करीब 21 लाख वर्ष पहले तक की पंचांगीय गणनाओं को देखा और उनका अध्ययन किया जा सकता है। वहीं, करीब 5 लाख वर्ष भविष्य तक की कालगणना देखने की सुविधा भी विकसित की गई है।
किसी निर्धारित तारीख को चुनने पर उस समय की तिथि, पक्ष, नक्षत्र, योग, करण, हिंदू मास समेत दूसरे कालगणनात्मक विवरण भी देखे जा सकेंगे। यानी यह सिर्फ वर्तमान समय बताने वाली घड़ी नहीं है। इसे भारतीय कालगणना की लंबी परंपरा और उसके गणित को डिजिटल रूप में समझने के एक माध्यम के तौर पर विकसित किया गया है।
विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 में सिर्फ पंचांग से जुड़ी जानकारी ही नहीं होगी। इसमें सूर्य और चंद्रमा के साथ नवग्रहों की स्थिति, उनकी राशि और नक्षत्र में गोचर, ग्रहों के परिवर्तन और उनकी मार्गी-वक्री गति से जुड़ी जानकारी भी प्रदर्शित की गई है। इससे यूजर किसी समय विशेष पर ग्रहों की स्थिति और उससे संबंधित ज्योतिषीय गणनाओं को भी देख सकता है। घड़ी की मूल कालगणना प्रणाली को ऑफलाइन काम करने के लिए विकसित किया गया है। इसका मतलब है कि इसके मूल कालगणना फीचर्स के इस्तेमाल के लिए लगातार इंटरनेट कनेक्शन जरूरी नहीं होगा।
विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 को सिर्फ वॉल क्लॉक तक सीमित नहीं रखा गया है। इसे आधुनिक Smart Wrist Watch के रूप में भी विकसित किया गया है। रिस्ट वॉच में यूजर के स्थान, अक्षांश और देशांतर के आधार पर वैदिक समय और पंचांग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी।
इसमें एक अलग Energy Feature भी जोड़ा गया है। इसके तहत शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आत्मिक और कार्मिक ऊर्जा का विश्लेषण करने वाला मॉडल शामिल किया गया है। यह मॉडल जन्म तिथि, जन्म समय और जन्म स्थान के साथ संबंधित ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर रोजाना होने वाले बदलाव का आकलन प्रस्तुत करता है।
विक्रमादित्य वैदिक घड़ी-2.0 को भारतीय ज्ञान परंपरा, खगोलीय गणित और आधुनिक डिजिटल तकनीक के साथ Wearable Technology को जोड़ने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया है। इस पहल का उद्देश्य प्राचीन भारतीय कालगणना की अवधारणाओं को आधुनिक डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंचाना है। साथ ही, भारतीय पंचांग और खगोलीय गणित से जुड़ी परंपरागत जानकारी को आधुनिक तकनीक के जरिए एक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। सरकार के अनुसार, यह पहल 'विरासत से विकास' की सोच के अनुरूप है, जिसमें भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर नई पीढ़ी के लिए उपयोगी बनाया जा सके।
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