
रीवा की खेती के लिए आने वाला समय बड़ा बदलाव लेकर आ सकता है। जिस इलाके की पहचान धान, गेहूं, चना, मसूर और सोयाबीन जैसी फसलों से रही है, वहां अब सिंचाई की तस्वीर बदलने की तैयारी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि स्लीमनाबाद टनल का काम तेजी से पूरा होने की ओर है और इसके पूरा होते ही रीवा जिले के खेतों तक नर्मदा का पानी पहुंच सकेगा।
मुख्यमंत्री ने मंत्रालय से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए रीवा में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव में किसानों से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने सिंचाई, प्राकृतिक खेती, उद्यानिकी, श्रीअन्न और किसान हित से जुड़े कई मुद्दों पर जानकारी साझा की।
रीवा के किसानों के लिए स्लीमनाबाद टनल परियोजना को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री के मुताबिक इसके पूरा होने के बाद नर्मदा जल रीवा के खेतों तक पहुंचाया जाएगा। इससे क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की सुविधाओं को बढ़ाने में मदद मिलने की बात कही गई है।
इसके साथ ही त्योंथर, लोंही, सिरमौर और सेमरिया की सिंचाई परियोजनाएं पूरी होने पर करीब 1.32 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने की जानकारी मुख्यमंत्री ने दी। यानी आने वाले समय में रीवा के कृषि क्षेत्र में सिंचित रकबे के विस्तार की उम्मीद है, जिसका सीधा संबंध फसल उत्पादन और खेती में विविधता से भी है।
किसानों और पट्टाधारकों के लिए मुख्यमंत्री ने एक और बड़ी घोषणा का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जिन लोगों के पास भूमि के पट्टे हैं, लेकिन उनकी रजिस्ट्री नहीं हुई है, ऐसे पट्टों की रजिस्ट्री राज्य सरकार नि:शुल्क कराएगी।
सरकार के अनुसार करीब 50 लाख पट्टों की रजिस्ट्री का शुल्क राज्य सरकार वहन करेगी। इसके लिए लगभग 4,000 करोड़ रुपये का खर्च बताया गया है। इसका उद्देश्य पट्टाधारकों को भूमि से जुड़े दस्तावेजी अधिकारों को मजबूत करने में मदद करना है।
रीवा में खेती को केवल सिंचाई के विस्तार तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए जिले में 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र को नेचुरल फार्मिंग क्लस्टर के रूप में विकसित किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने बसामन मामा गो-अभयारण्य में संचालित प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र का भी उल्लेख किया। यहां किसानों को जीवामृत, घन जीवामृत और प्राकृतिक खेती से जुड़ी तकनीकों की जानकारी देने की व्यवस्था की गई है। किसानों से प्राकृतिक खेती के साथ उद्यानिकी, पशुपालन, श्रीअन्न और फसल विविधीकरण अपनाने का भी आह्वान किया गया।
रीवा की कृषि अर्थव्यवस्था में पारंपरिक फसलों के साथ उद्यानिकी का योगदान भी बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री के मुताबिक जिले में अमरूद, आंवला और कटहल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इसके अलावा राज्य मिलेट मिशन के तहत कोदो-कुटकी जैसी फसलों के विस्तार पर भी जोर दिया जा रहा है। श्रीअन्न को खेती में विविधता लाने के साथ पोषण सुरक्षा से भी जोड़ा जा रहा है।
बलराम कृषि महोत्सव में मुख्यमंत्री ने चार प्रगतिशील किसानों से संवाद कर पारंपरिक और आधुनिक खेती के बीच उनके अनुभव भी जाने। किसानों ने उन्नत कृषि यंत्रों और जैविक खाद के इस्तेमाल से खेती में होने वाले लाभों की जानकारी साझा की।
रीवा में सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार, प्राकृतिक खेती के क्लस्टर, उद्यानिकी और मिलेट जैसी फसलों को बढ़ावा—ये सभी प्रयास कृषि को एक ही फसल पर निर्भर रहने से अलग दिशा देने की कोशिश हैं। अगर स्लीमनाबाद टनल और संबंधित सिंचाई परियोजनाएं तय योजना के अनुसार पूरी होती हैं, तो रीवा के बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई का अतिरिक्त आधार मिल सकता है। इससे किसानों के लिए फसल विविधीकरण और आधुनिक खेती के नए विकल्प खुलने की संभावना है।
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