
असम के राज्यपाल श्री लक्ष्मण प्रसाद आचार्य भगवान बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों अरहंत सारिपुत्र और अरहंत महामौद्गल्यायन के पवित्र अवशेषों को भारतीय वायु सेना के विशेष विमान के माध्यम से मंगोलिया लेकर पहुंचे। मंगोलिया पहुंचने पर हवाई अड्डे पर वहां के शिक्षा मंत्री एल. एंख-अमगलान और गंडनतेगचेनलिंग मठ के मुख्य महंत खाम्बा नोमुन खान गेशे ल्हारम्पा डी. जावज़ानदोरज ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया।
पवित्र अवशेषों के स्वागत के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। लोगों ने श्रद्धा और भक्ति के साथ इन अवशेषों को नमन कर अपनी आस्था प्रकट की। इस अवसर पर वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत दिखाई दिया।
इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान राज्यपाल श्री आचार्य के साथ मध्यप्रदेश शासन के अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व तथा सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारी श्री शिव शेखर शुक्ला भी उपस्थित रहे। इसके अलावा भारत सरकार, मध्यप्रदेश शासन, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (IBC), भारत और श्रीलंका के वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं सहित एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी कार्यक्रम में शामिल हुआ। समारोह में मंगोलिया के विभिन्न प्रमुख मठों के महंत, अनेक बौद्ध भिक्षु तथा मंगोलिया के पूर्व राष्ट्रपति नामबारिन एंखबयार की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की विशेष पहल पर सांची स्तूप में संरक्षित भगवान बुद्ध के परम शिष्यों अरहंत सारिपुत्र और अरहंत महामौद्गल्यायन के पवित्र अवशेषों को सार्वजनिक दर्शन के लिए मंगोलिया भेजा गया है। मंगोलिया की प्रसिद्ध गंदन मॉनेस्ट्री में इन पवित्र अवशेषों को 9 जून 2026 तक दर्शनार्थ रखा जाएगा। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं और बौद्ध अनुयायियों को इन दिव्य अवशेषों के दर्शन करने का अवसर मिलेगा।
यह पहल केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। इससे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पर्यटन सहयोग और धार्मिक संबंधों को नई मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से भारत के बौद्ध तीर्थ सर्किट, खासकर सांची जैसे विश्वप्रसिद्ध स्थलों की अंतरराष्ट्रीय पहचान और अधिक मजबूत होगी। इससे विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन को भी नया प्रोत्साहन मिलेगा।
मध्यप्रदेश के लिए यह अवसर विशेष महत्व रखता है। सांची स्तूप पहले से ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और विश्वभर के बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस पहल के माध्यम से राज्य के बौद्ध पर्यटन स्थलों को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी। साथ ही विदेशी पर्यटकों की आवाजाही, उनके प्रवास की अवधि और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी वृद्धि होने की संभावना है। यह कदम भारत और मंगोलिया के मठों, संग्रहालयों तथा सांस्कृतिक संस्थानों के बीच दीर्घकालिक सहयोग के नए अवसर भी तैयार करेगा।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची स्तूप में संरक्षित ये पवित्र अवशेष भगवान बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों अरहंत सारिपुत्र और अरहंत महामौद्गल्यायन से जुड़े हैं। बौद्ध परंपरा में दोनों को ‘अग्र युग्म’ के रूप में सम्मान प्राप्त है। सारिपुत्र अपनी अद्वितीय प्रज्ञा और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे, जबकि महामौद्गल्यायन आध्यात्मिक शक्तियों और अलौकिक सिद्धियों के लिए जाने जाते थे।
दोनों महापुरुषों ने बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार में अमूल्य योगदान दिया। उनकी शिक्षाएं आज भी बौद्ध दर्शन, साधना और आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती हैं।
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