
उत्तराखण्ड सरकार ने मसूरी स्थित एमपीजी कॉलेज में लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और प्रबंधन संबंधी जटिलताओं को दूर करने की दिशा में अहम कदम उठाया है। उच्च शिक्षा विभाग ने सार्वजनिक नोटिस जारी कर कॉलेज में प्राधिकृत नियंत्रक (Authorized Controller) नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकार का कहना है कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य महाविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों को सुचारु बनाना तथा छात्रों और कर्मचारियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना है।
एमपीजी कॉलेज, मसूरी की स्थापना वर्ष 1963 में हुई थी। वर्षों से इसका संचालन एक प्रबंधन समिति के माध्यम से किया जाता रहा है। यह महाविद्यालय हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर से संबद्ध है। विश्वविद्यालय ने पहले प्रबंधन समिति को सीमित अवधि के लिए मान्यता प्रदान की थी। हालांकि, नगर निकाय चुनावों के बाद गठित नई प्रबंधन समिति के अनुमोदन की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। इसी कारण कॉलेज के प्रशासनिक संचालन को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार, विश्वविद्यालय ने अपने विभिन्न पत्रों के माध्यम से जानकारी दी है कि नई प्रबंधन समिति के अनुमोदन का मामला अभी विचाराधीन है। विभाग का कहना है कि जब तक नई समिति को औपचारिक मंजूरी नहीं मिलती, तब तक महाविद्यालय के नियमित संचालन के लिए अधिनियम के तहत कोई स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। यही स्थिति अब सरकार की चिंता का प्रमुख कारण बन गई है।
सरकार के संज्ञान में यह बात भी आई है कि प्रबंधन संबंधी असमंजस का असर कॉलेज के दैनिक कार्यों पर पड़ रहा है। शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान, नई नियुक्तियों, पदोन्नतियों और अन्य सेवा संबंधी मामलों के निस्तारण में कठिनाइयां सामने आ रही हैं। इसके साथ ही शैक्षणिक गतिविधियों पर भी असर पड़ने की बात कही गई है। छात्र संख्या में कमी आने की आशंका, प्रशासनिक निर्णयों में देरी और वित्तीय अनियमितताओं की संभावनाएं भी विभाग की चिंता का विषय बनी हुई हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 57 और 58 के तहत महाविद्यालय में प्राधिकृत नियंत्रक नियुक्त करने का निर्णय लिया है। सरकार का मानना है कि प्राधिकृत नियंत्रक की नियुक्ति से कॉलेज के प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय कार्यों को व्यवस्थित ढंग से संचालित किया जा सकेगा। साथ ही कर्मचारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से जुड़े लंबित मामलों के समाधान में भी तेजी आएगी।
उच्च शिक्षा विभाग ने इस संबंध में सार्वजनिक सूचना जारी करते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति, संस्था या संबंधित पक्ष को प्रस्तावित कार्रवाई पर कोई आपत्ति या सुझाव देना है, तो वह निर्धारित तिथि से एक सप्ताह के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता है। लिखित आपत्तियां सचिव, उच्च शिक्षा विभाग, उत्तराखण्ड शासन को डाक, ई-मेल अथवा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इसके बाद प्राप्त सुझावों और आपत्तियों पर विचार करते हुए आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस पूरी पहल का उद्देश्य किसी पक्ष विशेष को प्रभावित करना नहीं, बल्कि कॉलेज में सामान्य शैक्षणिक वातावरण को बहाल करना है। सरकार चाहती है कि संस्थान में शैक्षणिक गुणवत्ता, प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित हो। साथ ही विद्यार्थियों की पढ़ाई, परीक्षाओं और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव न पड़े। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्राधिकृत नियंत्रक नियुक्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
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