
नई दिल्ली। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गुरुवार को उत्तराखंड की बेहद अहम 125 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन के काम की तारीफ की। उन्होंने इसे हिमालय के मुश्किल पहाड़ों के बीच तैयार किया गया एक 'इंजीनियरिंग का चमत्कार' और राज्य के 'भविष्य की लाइफलाइन' बताया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर मंत्री ने लिखा, "हिमालय के बीच इंजीनियरिंग! 125 किमी, 12 स्टेशन, 83% सुरंगें। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन सिर्फ एक ट्रैक नहीं है, यह उत्तराखंड के भविष्य की लाइफलाइन है।"
Engineering through the Himalayas!
125 km, 12 stations, 83% tunnels.
The Rishikesh-Karnaprayag rail line is not just a track, it's Uttarakhand's lifeline to the future.
— Ashwini Vaishnaw (@AshwiniVaishnaw) October 22, 2026
वैष्णव ने इस बड़े पहाड़ी रेल प्रोजेक्ट की प्रोग्रेस के बारे में भी बताया। इसमें 16 सुरंगें और 19 पुल बन रहे हैं, जो इसे भारतीय रेलवे के सबसे मुश्किल प्रोजेक्ट्स में से एक बनाता है। एक वीडियो पोस्ट में उन्होंने कहा, "ऋषिकेश से कर्णप्रयाग उत्तराखंड का एक बहुत ही जरूरी रेलवे प्रोजेक्ट है। इसे हिमालय की जटिल बनावट के बीच डिजाइन किया गया है। 125 किलोमीटर के इस प्रोजेक्ट में लगभग 83% हिस्सा सुरंगों का है, यानी करीब 104 किलोमीटर लंबी सुरंगें बन रही हैं। इसमें 16 सुरंगें और 19 पुल हैं। अगर आप इसे ध्यान से देखें, तो यह प्रोजेक्ट मूल रूप से सुरंग, पुल, सुरंग, पुल के पैटर्न पर चल रहा है।"
पहाड़ों की मुश्किलों को समझाते हुए मंत्री ने बताया कि 'यंग फोल्ड माउंटेन्स' (Young Fold Mountains) में अक्सर ठोस ग्रेनाइट चट्टानों के बजाय नरम मिट्टी और ह्यूमस होता है। इस वजह से जब सुरंग खोदी जाती है, तो वह अंदर की तरफ सिकुड़ने लगती है। इस समस्या से निपटने के लिए, इंजीनियरों ने प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली टनल बोरिंग मशीनों (TBM) में कुछ खास बदलाव किए। उन्होंने बताया,
जब इस कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट के लिए टनल बोरिंग मशीन (TBM) का इस्तेमाल करने का फैसला हुआ, तो पहले काफी गहरी जांच की गई। अगर सुरंग ठोस चट्टान के बीच से खोदी जाती है, तो वह सिकुड़ती नहीं है। लेकिन नरम मिट्टी में सुरंग के अंदर की तरफ सिकुड़ने का खतरा रहता है। इस सिकुड़न को ध्यान में रखते हुए टनल बोरिंग मशीन के डिजाइन में बदलाव किए गए। कटर हेड में कई बदलाव किए गए। इसके बाद, शील्ड में भी बड़े बदलाव हुए जहां सेगमेंटल लाइनिंग प्लेट असेंबली होती है। इसके ड्राइव सिस्टम में एक खास डिजाइन लगाया गया ताकि एक्स्ट्रा टॉर्क और एक्स्ट्रा थ्रस्ट मिल सके। इसी खास डिजाइन की वजह से टनल बोरिंग मशीन ऋषिकेश-कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट में इतनी सफल साबित हुई है।
काम की मौजूदा स्थिति पर वैष्णव ने बताया कि सुरंग T-1 और T-5 को छोड़कर, बाकी ज्यादातर हिस्सों में काम काफी आगे बढ़ चुका है। उन्होंने कहा,
"टनल 1 सबसे मुश्किल हिस्सा है। यह 11 किलोमीटर लंबी है। यह इसलिए मुश्किल है क्योंकि यहां की भौगोलिक स्थिति सबसे ज्यादा जटिल है। आगे की कई सुरंगें पहले ही पूरी हो चुकी हैं। इस इलाके में काफी लोग भी रहते हैं, इसलिए जमीन को स्थिर रखने के लिए माइक्रोपाइल्स (micropiles) का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुल मिलाकर, इस प्रोजेक्ट की प्रोग्रेस बहुत अच्छी है... T-5 और T-1 पर भी काम तेजी से चल रहा है।"
इस रूट पर शिवपुरी, ब्यासी, देवप्रयाग, जनासू, मलेथा, श्रीनगर, धारी देवी, तिलानी, घोलतीर, गौचर और कर्णप्रयाग स्टेशन शामिल हैं। पर्यटन और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों के लिए इसकी अहमियत बताते हुए वैष्णव ने कहा,
एक बार यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए, तो कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग की यात्रा और केदारनाथ-बद्रीनाथ के दर्शन बहुत आसान हो जाएंगे। इसके अलावा, रणनीतिक नजरिए से भी यह प्रोजेक्ट बेहद अहम है क्योंकि इसका आखिरी स्टेशन, कर्णप्रयाग, भारत-चीन सीमा से सिर्फ 123 किलोमीटर दूर है।
एक अलग पोस्ट में, रेल मंत्री ने यह भी बताया कि कैसे भारत अब इन बड़े टनलिंग प्रोजेक्ट्स के लिए देश में ही टनल बोरिंग मशीनें (TBM) बना रहा है। वैष्णव ने बताया कि 'आत्मनिर्भर भारत' विजन के तहत अब टनल बोरिंग मशीनों का पूरा इकोसिस्टम देश में ही तैयार हो रहा है, जिससे विदेशी मशीनों पर हमारी पुरानी निर्भरता खत्म हो रही है। उन्होंने कहा,
देश भर में इस वक्त रेलवे, हाईवे या पावर सेक्टर के लिए जो बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, उसमें टनल बोरिंग मशीनों (TBM) की बहुत जरूरत होती है। एक समय था जब सभी टनल बोरिंग मशीनें बाहर से मंगवानी पड़ती थीं। लेकिन अब, 8-मीटर व्यास (diameter) वाली सभी टनल बोरिंग मशीनें भारत में ही बन रही हैं। यही नहीं, 15-मीटर वाली मशीनें भी अब भारत में बननी शुरू हो गई हैं। तमिलनाडु में एक TBM प्लांट है। और बहुत जल्द, 16 मीटर से ज्यादा व्यास वाली TBM भी भारत में बनेंगी। इसका मतलब है कि भारत अब TBM के मामले में डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस तक पूरी तरह आत्मनिर्भर बन रहा है।
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