
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संस्कृत शिक्षा को लेकर बड़ा फोकस तय किया है। मुख्यमंत्री आवास पर संस्कृत शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में उन्होंने आगामी हरिद्वार कुंभ को ध्यान में रखते हुए संस्कृत से जुड़े कार्यों की विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। साथ ही मॉडल संस्कृत गांवों में पूरे साल नियमित रूप से संस्कृत संवाद और संस्कृत आधारित गतिविधियां आयोजित करने पर जोर दिया।
हरिद्वार में 2027 में होने वाले कुंभ को लेकर राज्य सरकार पहले से तैयारियों में जुटी है। हालिया सरकारी जानकारी के मुताबिक कुंभ 1 जनवरी से 30 अप्रैल 2027 तक आयोजित होगा और इसमें चार अमृत स्नान समेत 10 प्रमुख स्नान पर्व होंगे। कुंभ क्षेत्र को चार जिलों और 32 सेक्टरों में बांटकर व्यवस्थाओं पर काम किया जा रहा है।
बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि हरिद्वार में कुंभ को देखते हुए संस्कृत के क्षेत्र में होने वाले कार्यों को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाए। इसके लिए अधिकारियों को व्यापक एक्शन प्लान तैयार करने को कहा गया है। सरकार की कोशिश सिर्फ कुंभ के दौरान संस्कृत कार्यक्रम कराने तक सीमित रखने की नहीं है। मॉडल संस्कृत गांवों में सालभर संस्कृत संवाद, चर्चा और दूसरी संस्कृत आधारित गतिविधियां नियमित रूप से चलाने के निर्देश दिए गए हैं। यानी संस्कृत को आयोजन विशेष तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा के सांस्कृतिक जीवन से जोड़ने पर जोर है। हरिद्वार पहले से ही उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र है। राज्य सरकार की आधिकारिक जानकारी में भी इसे कुंभ और कांवड़ यात्रा के लिए प्रसिद्ध प्रमुख धार्मिक नगर बताया गया है।
शासकीय आवास पर संस्कृत शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया कि आगामी कुंभ के दृष्टिगत हरिद्वार में संस्कृत के क्षेत्र में किए जाने वाले कार्यों की व्यापक कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही आदर्श संस्कृत ग्रामों में वर्षभर नियमित रूप से संस्कृत संभाषण एवं संस्कृत आधारित गतिविधियों का आयोजन सुनिश्चित किया जाए।
अधिकारियों को बच्चों को संस्कृत भाषा के साथ वेद, उपनिषद, पुराण एवं अन्य महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों की जानकारी सरल एवं रुचिकर माध्यम से देने समेत चारधाम सहित हर की पैड़ी, जागेश्वर धाम, आदि कैलाश, पूर्णागिरि, सुरकंडा देवी, धारी देवी, गर्जिया देवी मंदिर एवं वीरभद्र ऋषिकेश जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रभावी पहल करने के निर्देश दिए।
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) October 7, 2026
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को चारधाम समेत राज्य के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। इसमें बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के साथ हर की पैड़ी, जागेश्वर धाम, आदि कैलाश, पूर्णागिरि, सुरकंडा देवी, धारी देवी, गर्जिया देवी मंदिर और वीरभद्र ऋषिकेश जैसे धार्मिक स्थलों को भी शामिल किया गया है।
यह पहल धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। उत्तराखंड सरकार खुद राज्य की पहचान को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है। राज्य में चारधाम के अलावा जागेश्वर समेत कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग योजनाओं पर काम हो रहा है।
बैठक में बच्चों के बीच संस्कृत को लेकर रुचि पैदा करने पर भी विशेष जोर दिया गया। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि बच्चों को संस्कृत भाषा के साथ-साथ वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों की जानकारी सरल और रोचक तरीके से दी जाए। इसका उद्देश्य केवल संस्कृत पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों को भारतीय ज्ञान परंपरा और उससे जुड़े साहित्य से परिचित कराना है। इसके लिए भाषा को कठिन या केवल शास्त्रीय अध्ययन तक सीमित रखने के बजाय उसे बच्चों के लिए सहज और दिलचस्प बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
मॉडल संस्कृत गांवों को इस अभियान का अहम आधार बनाया जा रहा है। यहां नियमित संस्कृत संवाद और संस्कृत आधारित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। इससे गांवों में संस्कृत के इस्तेमाल और उससे जुड़ी सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश होगी। उत्तराखंड में संस्कृत शिक्षा अलग से सरकारी पोर्टफोलियो का हिस्सा है और वर्तमान में यह जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के विभागों में शामिल है।
हरिद्वार कुंभ 2027 को उत्तराखंड सरकार केवल बड़े धार्मिक आयोजन के तौर पर नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान को सामने रखने के अवसर के रूप में भी देख रही है। सरकार की जनभागीदारी पहल में भी कुंभ को आस्था, संस्कृति और भारतीय परंपरा के बड़े संगम के रूप में रेखांकित किया गया है।
कुंभ की स्थायी व्यवस्थाओं पर भी तेजी से काम चल रहा है। सरकार ने पहले ही कुंभ से जुड़े स्थायी प्रकृति के कार्यों को अक्टूबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा था। ऐसे में संस्कृत से जुड़ी यह पहल कुंभ की धार्मिक गतिविधियों के साथ राज्य की भाषा, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को भी जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।
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