
जब एडवांस सेमी कंडक्टर या एआई चिप्स जैसी लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की बात आई तो अमेरिका ने अपने एक्सपोर्ट पर कंट्रोल करना शुरू कर दिया और एक्सपोर्ट कानूनों को और कड़ा बना दिया। इस कदम को अमेरिका ने अपनी सुरक्षा और प्रॉफिट की रक्षा के लिए जरूरी बताया। यह उपाय बड़े पैमाने पर चाइनीज इंस्टीट्यूशंस को टारगेट करके अपनाए गए हैं। क्योंकि चीन इन टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकता है, संदेह है कि चीन इसकी कॉपी करके सैन्य उपयोग भी कर सकता है। चीन के अलावा अन्य समान विचारधारा वाले देश इस एडवांस टेक्नोलॉजी को सेल करते हैं, जिसमें अमेरिका भी सहयोग करता है। इसके अलावा जापान और नीदरलैंड ने भी अपने एक्सपोर्ट पर कंट्रोल किया है लेकिन उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया कि इसकी वजह से ऐसा किया जा रहा है। उन्होंने एडवांस टेक्नोलॉजी के निर्यात को रोकने के लिए अपने अधिकारियों को पूरा पॉवर भी दिया है। इसका सीधा मतलब है कि इन देशों से टेक्नोलॉजी इंपोर्ट करने के लिए भारत सहित सभी दूसरे देशों को निर्यात लाइसेंस की जरूरत पड़ेगी। भारत इसे कैसे नेविगेट कर सकता है, यह समझना ज्यादा जरूरी है। एक्सपोर्ट कंट्रोल के उपाय ऐसे समय में हो रहे हैं, जब कई देश एडवांस टेक्नोलॉजी की पहुंच के लिए दूसरे देशों के साथ टेक्नोलॉजी आधारित साझेदारी कर रहे हैं।
अमेरिका और चीन का तनाव
अक्टूबर 2022 में अमेरिका ने एक्सपोर्ट कंट्रोल करने का ऐलान किया और तर्क दिया कि इससे चीन के सैन्य-नागरिक संलयन (एमसीएफ) को टारगेट किया गया है। माना जाता है कि एमसीएफ की वजह से चीन पब्लिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग सैन्य प्रोयोगों के लिए करता है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने अक्टूबर 2022 में कहा कि चीन सामूहिक विनाश के हथियारों के साथ ही एडवांस टेक्नोलॉजी का उपयोग सैन्य सिस्टम के प्रोडक्शन के लिए कर रहा है। इसी के बाद अमेरिका ने अपने एक्सपोर्ट को कंट्रोल करने के उपायों की घोषणा की। अमेरिका ने कहा कि चीन अपने सैन्य फैसले लेने, प्लानिंग और रसद सिस्टम में तेजी लाने, सटीकता में सुधार करने और यहां तक मानवाधिकारों का हनन करने में इन तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। यह कंट्रोल चीन के प्रतिशोधात्मक कार्यों को रोकने के लिए किया गया है। अमेरिका ने कहा एडवांस सेमी कंडक्टर, बैटरी और फोटो वोल्टिक सेल, ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों पर चीन का प्रभुत्व है। चीन ने इन्हीं क्षेत्रों में सख्त निर्यात कंट्रोल के उपाय लागू किए हैं। इससे भविष्य में ग्रीन टेक्नोलॉजी तक पहुंचने में भारत की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
उदाहरण के लिए बता दें कि जुलाई 2023 में चीन ने जर्मेनियम और गैलियम जैसे खनिजों का निर्यात करते समय निर्यातकों के लिए विशेष लाइसेंस लेने की नई जरूरत का नियम बना दिया। माइक्रोचिप्स बनाने के लिए यह आवश्यक खनिज है। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अक्टूबर 2023 में ऐसे ही उपाय अपनाए गए। चीन ने ऐलान किया कि सिंथेटिक ग्रेफाइट (बैटरी में उपयोग किया जाता है) का एक्सपोर्ट करते समय, एक्सपोर्टर्स को पूरा दस्तावेज देना होगा, जिसमें किसे एक्सपोर्ट किया जाना है, उसका विवरण भी शामिल रहेगा।
एक्सपोर्ट कंट्रोल के उपाय क्यों जरूरी
इस मामले में यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अमेरिका-चीन ट्रेड वार के विपरीत निर्यात नियंत्रण उपाय अलग है। अमेरिका-चीन ट्रेड वार ने वियतनाम जैसे अन्य देशों पर लाभकारी प्रभाव डाला है। यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारत चीनी वस्तुओं पर हाई टैरिफ और ग्लोबल सप्लाई चेन की विविधता का लाभ ले सकता है। हालांकि जूरी अभी भी इस बात पर असमंजस में है कि क्या भारत ने चीन से अलग सप्लाई सीरीज की ऑफशोरिंग से कोई लाभ लिया है या नहीं। हाल ही में अमेरिका और चीन के एक्सपोर्ट कंट्रोल उपायों ने ग्लोबल ट्रेड वार को अधिक तेजी से प्रभावित किया है।
सबसे पहले चीन पर अमेरिकी टैरिफ ने तीसरे देशों को लाभ पहुंचाया क्योंकि टैरिफ प्रभावी होने के बाद उत्पादन लागत में कमी आई। हालांकि एक्सपोर्ट कंट्रोल उपाय एडवांस टेक्नोलॉजी और महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच को खतरे में डालने वाला है। उदाहरण के लिए अमेरिका के पास एडवांस सेमी कंडक्टर की तकनीकी बढ़त है। इसलिए यह संभावना नहीं है कि कि दूसरे देश एक्सपोर्ट कंट्रोल की वजह से एडवांस सेमी कंडक्टर तक पहुंच के लिए दूसरे सोर्स ढूंढ पाएंगे। यहां तक भारी मात्रा में पूंजी लगाने के बाद भी सेमी कंडक्टर इंडस्ट्री में सफलता की निश्चितता नहीं है। उदाहरण के लिए कहा जा सकता है कि कई अरब डॉलर के निवेश के बाद भी चीन अपने सेमी कंडक्टर इंडस्ट्री को ज्यादा सफल नहीं बना पाया है।
दूसरा यह कि जापान और नीदरलैंड जैसे देशों ने अपने निर्यात नियंत्रण कानूनों को संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जोड़ दिया है। हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत जापान और नीदरलैंड दोनों ने अपने नए एक्सपोर्ट कंट्रोल उपायों के लिए किसी देश को टारगेट नहीं किया। भारत को यहां सतर्क रहना चाहिए क्योंकि इस एडवांस टेक्नोलॉजी को प्रतिबंधित तीसरे पक्ष के माध्यम से पाने पर नजर रखना होगा। ऐसी चिंताएं भी सामने आई हैं कि कुछ रूसी संस्थाओं ने भारत के माध्यम से एडवांस माइक्रोचिप्स को रूट करके अमेरिकी एक्सपोर्ट कंट्रोल के उपायों को दरकिनार कर दिया है। भले ही इंपोर्ट करने वाले देश की पहचान और सामान को भारतीय सीमा शुल्क अधिकारियों से छिपाया जाता हो, फिर भी अधिक सावधान रहने की जरूरत है।
निष्कर्ष
ऐसा माना जा सकता है कि अधिकांश देशों में एक्सपोर्ट कंट्रोल कानूनों का कड़ा बनाकर एडवांस तकनीक के लिए भारत की खोज को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। हालांकि भारत और अमेरिका ने मार्च 2023 में रणनीतिक व्यापार वार्ता (एसटीडी) का ऐलान किया है, जो इस साल जून में बुलाई गई थी। इसके अलावा अमेरिका की ओर से कुछ अतिरिक्त बदलाव लाए जाने की भी चर्चा है। उदाहरण के लिए जून 2023 में पीएम नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले कानूनविदों मार्क वार्नर और जॉन कॉर्निन ने शस्त्र निर्यात नियंत्रण अधिनियम के तहत विदेशी सैन्य बिक्री और निर्यात के लिए भारत की पात्रता बढ़ाने का भी विधेयक पेश किया। इससे भारत के साथ किसी भी रक्षा सौदे से पहले अमेरिकी कांग्रेस को सूचित करने की समय सीमा मौजूदा 30 दिनों से घटाकर 15 दिन करने की कोशिश की जाएगी। इसके अलावा सितंबर 2023 में भारत को हाई परफार्मेंस वाले कंप्यूटर और संबंधित उपकरणों की बिक्री के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भारत के लिए टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट अधिनियम पेश किया गया था। भारत और अमेरिका के बीच संबंधों की गर्माहट से शायद अब भारत के लिए अमेरिका से हाई टेक्नोलॉजी की मांग पर सवालों का समाधान खोजने का यह सही समय है।
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