Good News: मंगल ग्रह पर बसेगी इंसानी बस्ती, घर बनाने के लिए जिन अंतरिक्ष ईंटों की जरूरत होगी, वह भारत में बनी

Published : May 01, 2022, 03:29 PM IST
Good News: मंगल ग्रह पर बसेगी इंसानी बस्ती, घर बनाने के लिए जिन अंतरिक्ष ईंटों की जरूरत होगी, वह भारत में बनी

सार

मंगल ग्रह पर जो इंसानी बस्तियां बसेंगी, उसके लिए भवन निर्माण में विशेष तरह के ईंट की जरूरत होगी। यह खास ईंट भारत में बनाई जा रही है और इसे नाम दिया गया है अंतरिक्ष ईंट। 

नई दिल्ली। अच्छी खबर यह है कि मंगल ग्रह पर जल्द ही इंसानी बस्तियां बसने जा रही हैं। उससे भी अच्छी खबर यह है कि इन बस्तियों में जो घर बनेंगे, उसके लिए ईंटों की जरूरत भारत पूरा कर रहा है। जी हां, ये अंतरिक्ष ईंट भारत में बन रहे हैं। बेंगलुरु स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) और भारतीय विज्ञान संस्थान यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) मिलकर इस महाअभियान को पूरा करने में जुटे हैं। 

दरअसल, दोनों संस्थान के वैज्ञानिक अंतरिक्ष ईंट बनाने में मंगल ग्रह की सिम्युलेट सॉइल यानी प्रतिकृति मिट्टी और यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन अंतरिक्ष ईंटों का इस्तेमाल, मंगल ग्रह पर जो इमारतें और भवन बनेंगे, उसके निर्माण में होगा। बताया जा रहा है कि अंतरिक्ष ईंट को मंगल सिम्युलेट सॉइल को ग्वार गम, स्पोरोसरसीना पेस्तुरी बैक्टेरिया, निकिल क्लोराइड और यूरिया के मिश्रित घोल से तैयार किया गया है। 

 

 

चांद की मिट्टी से भी बनाई जा चुकी है ईंट, वह बेलन आकार की थी 
वैज्ञानिकों का दावा है कि इस खास घोल को सांचे में डालते हैं। इसके बाद कुछ दिन में बैक्टेरिया, यूरिया को कैल्शियम कॉर्बोनेट के क्रिस्टल में बदल देते हैं और मिट्टी के कणों को साथ में जोड़े रखते हैं। इससे पहले, चांद की मिट्टी से भी ईंट बनाई जा चुकी है। हालांकि, वह ईंट बेलन आकार की थी, जबकि इसे क्रिस्टल आकार में चौकोर बनाया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रक्रिया में पानी और मिट्टी को सही मात्रा में मिलाना पड़ता है। यही फॉर्मूला चांद के लिए बनाई गई बेलन आकार की ईंट के लिए अपनाया गया था। 

वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे, जांच के लिए ईंट मंगल पर भेजी जाएगी 
अब इन ईंटों को जांच के लिए मंगल के वायुमंडल में भेजा जाएगा। वहीं, इसका परीक्षण किया जाएगा कि ईंट टिक सकेगी या नहीं और यह वहां के वायुमंडल में कितना मजबूत साबित होगी। मंगल का वायुमंडल धरती के वातावरण से करीब सौ गुना पतला है। वहीं, इसमें लगभग 95 प्रतिशत कॉर्बन डाई ऑक्साइड है। यह बैक्टेरिया के विकास को प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पर और अध्ययन किया जा रहा है। 

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