
ट्रेंडिंग डेस्क. केरल के एक दंपति सी शुक्कुर और डॉ. शीना शुक्कुर ने शादी के 29 साल बाद विशेष विवाह अधिनियम के तहत अपनी शादी को रजिस्टर करा लिया, जिससे वे अपनी तीन बेटियों को अपनी संपत्ति दे सकें। इसके बाद से मुस्लिम बेटियों को माता-पिता की संपत्ति दिए जाने को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ गई है।
मेवाती मुस्लिम महिलओं को रोकता है ये कानून
दरअसल, उत्तर भारत में अभी भी एक प्रथागत कानून व्यवस्था लागू है जिसके तहत मेवाती मुस्लिम महिलाओं को माता-पिता की विरासत का कोई अधिकार नहीं। मेवात के चार जिले मेवात, रेवाड़ी, फरीदाबाद और पुराना गुड़गांव में मुस्लिम महिलाओं का पैतृक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है, भले ही वह अपने मां-बाप की इकलौती संतान क्यों न हों।
किसने बनाया था रिवाज-ए-कानून?
आवाज द वॉइस के मुताबिक ये कानून अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था, जिसे नाम दिया गया था 'रिवज-ए-कानून'। एक तरह से ये कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ की जगह लेता है। उस दौर में पंजाब और हरियाणा के कृषि क्षेत्रों में प्रचलित अलग-अलग रीति-रिवाजों को एक जैसा बनाने के लिए सर डब्ल्यू एच रैटिगन ने ये कानून लिखा था।
विधवा/अविवाहित महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित
इस कानून से सबसे ज्यादा विधवा या अविवाहित महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं क्योंकि पति की मृत्यु होने पर या छोड़े जाने पर पति या पिता किसी भी संपत्ति पर उनका अधिकार नहीं होता और ऐसी महिलाएं अपना हक पाने के लिए लगातार कोर्ट के चक्कर काट रही हैं। इस अजीब कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति के बेटा न हो और केवल बेटियां हों तो उसकी संपत्ति स्वतः ही उसके परिवार के सगे संबंधियों के नाम हो जाएगी। वहीं अब मेवात में इस पुराने और बेढंगे कानून को हटाने की मांग तेज हो चली है।
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