
नई दिल्ली। Azab Gazab: क्या कोई जीते-जी खुद मरने की तैयारी करता है। वह भी कुछ मिनट, घंटे या फिर एक-दो दिन पहले नहीं बल्कि, करीब सात साल पहले। जी हां, जापान में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो करीब सात साल पहले मरने की तैयारी करने लगते हैं। यह सब कुछ तीन अलग-अलग चरणों में होता है।
कुछ लोग तीन चरणों तक पूरा होते-होते मर जाते हैं। वहीं, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो पहले या दूसरे चरण में ही मर जाते हैं। हालांकि, यह उनका खुद का फैसला होता है, इसलिए इस पर कोई किसी तरह की रोक-टोक नहीं लगाता। तो आइए जानते हैं कि पूरा मामला क्या है और कहां ऐसे लोग हैं, जो मरने के लिए पूरी तैयारी करते हैं वह भी अलग-अलग चरणों में। बाद में कुछ लोग इन भिक्षुओं को मौत को मौत के बाद सोने के पानी से कवर करके सहेज लेते हैं।
परंपरा निभाकर अपनी आध्यात्मिक ताकत का प्रदर्शन करते हैं बौद्ध भिक्षु
यह हैरान करने वाला मामला है जापाना का। यहां बौद्ध भिक्षु सोकोशिनबुत्सु (sokushinbutsu) होते हैं। इन भिक्षुओं में में ममी बनने की परंपरा होती है और इसके लिए वे लंबे समय से तैयारी शुरू कर देते हैं। हालांकि, इस तरह ये अपनी आध्यात्मिक ताकत का प्रदर्शन भी करते हैं। इसमें वे खुद को ममी बनाकर इसी स्वरूप में रहते हैं। ये बौद्ध भिक्षु इस अनोखी और हैरान कर देने वाली परंपरा के तहत करीब सात साल तक सधी हुई दिनचर्या का पालन करते हैं और सख्ती से इसी नियम के तहत जीते भी हैं।
क्या और कैसे करते है तीन चरणों में, कब मान लिया जाता कि मर गए
इस परंपरा के तहत वे आगे की लाइफ तीन चरण मे बीताते हैं। पहले चरण में एक हजार दिन तक बाकी सब खाना-पीना छोड़ देते हैं। सिर्फ वे नट्स और बींस खाकर जीवन गुजारते हैं। इसे अगर वे सफलता पूर्वक पार कर गए तो आता है, तो आता है दूसरा चरण। इसमें वे अगले एक हजार दिनों तक जहरीली चाय पीते हैं। बहुत से लोगों की इसमें मौत हो जाती है। वहीं, कुछ ऐसे भी हैं, जो सर्वाइव कर जाते हैं।
सबसे कठिन होता है तीसरा और अंतिम चरण
इसके बाद आता है तीसरा चरण। यह सबसे कठिन चरण होता है। इसमें वे एक मकबरे में खुद को बंद कर लेते हैं। यह मकबरा पूरी तरह पैक होता है। सिर्फ भिक्षु को सांस लेने के लिए एक नली बाहर निकली होती है। इससे हवा अंदर-बाहर होती है। भिक्षु इस दौरान रोज मकबरे में लगी एक घंटी बजाते हैं। जब तक यह घंटी बजती है, लोग मानते हैं कि भिक्षु अभी जीवित हैं। जिस दिन यह घंटी नहीं बजती, उस दिन मान लिया जाता है कि उनकी मौत हो चुकी है। कुछ दिन बाद मकबरा खोलते हैं और भिक्षु के शव को ममी बनाकर सहेज कर रख लिया जाता है।
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