
श्रीनगर: कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि 13 से 29 वर्ष की उम्र और उसके बाद 33 से 112 वर्ष की उम्र तक ईसा मसीह भारत में रहे थे। माना जाता है कि इस दौरान उन्होंने भारतीय राज्य कश्मीर में बौद्ध और नाथ संप्रदाय के मठों में रहकर ध्यान साधना की थी। मान्यता है कि यहीं कश्मीर के श्रीनगर शहर के एक पुराने इलाके खानयार की एक तंग गली में 'रौजाबल' नामक पत्थर की एक इमारत में एक कब्र बनी है जहां उनका शव रखा हुआ है।
मुस्लिमों और ईसाईयों की जंग
आधिकारिक तौर पर यह मजार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूजा आसफ का मकबरा है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि यह नजारेथ के यीशु यानी ईसा मसीह का मकबरा या मजार है। लोगों का यह भी मानना है कि सन 80 ई. में हुए प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भाग लिया था। श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार का खंडहर हैं जहां यह सम्मेलन हुआ था।
अरबी की जगह हिब्रू में है लिखावट
अरबी भाषा में जीसस को 'ईसस' कहा गया है। काश्मीर में उनको 'यूसा-आसफ़' कहा जाता था। उनकी कब्र पर भी लिखा गया है कि 'यह यूसा-आसफ़ की कब्र है जो दूर देश से यहां आकर रहा' और यहां भी संकेत मिलता है कि वह 1900 साल पहले आया। उस कब्र की बनावट यहूदी है। और कब्र के ऊपर यहूदी भाषा, हिब्रू में लिखा गया है।
1747 से चल रही है बहस
इतिहास में पहली बार इसकी चर्चा 1747 में हुई। जब श्रीनगर के सूफी लेखक ख्वाजा मोहम्मद आज़म ने अपनी किताब 'तारीख आज़मी' में लिखा कि ये मज़ार एक प्राचीन विदेशी पैगम्बर और राजकुमार युज़ असफ की है। इसके बाद 1770 में इसके बारे में एक मुकदमे का फैसला सुनाते हुए मुल्ला फाजिल ने कहा, 'सबूतों को देखने के बाद, ये नतीजा निकलता है कि राजा गोपदत्त, जिसने सोलोमन का सिंघासन बनवाया, के समय युज़ असफ घाटी में आए थे। मर कर जिंदा होने वाले उस महान शहजादे ने दुनियावी चीज़ों को छोड़ दिया था, वो अपना पूरा ध्यान सिर्फ इबादत में लगाता था। कश्मीर के लोग, जो हजरत नूह के बाद बुतपरस्त बन गए थे। उन्हें उसने ऊपर वाले की इबादत करने के लिए कहा। वो एक ही ऊपर वाला होने की बात कहते रहते थे। बाद में इस मजार में सैय्यद नसीरुद्दीन को भी दफनाया गया।'
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