
नई दिल्ली। पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति में बहुत फर्क है। यूरोप के देशों और अमेरिका में संबंधों में खुलापन बहुत ज्यादा है। वहां शादी के पहले शारीरिक संबंध बना लेना कोई बड़ी बात नहीं। लिव-इन जैसी परंपरा अमेरिका और यूरोप से ही शुरू हुई, जिसमें कपल बिना शादी किए एक साथ रहते हैं। लेकिन भारत के कुछ आदिवासी समुदायों में भी काफी खुलापन पाया जाता है। इन समुदायों में भी शादी के पहले मिलने-जुलने, एक साथ रहने और शारीरिक संबंध बनाने तक की छूट है। एक बार जब युवक-युवती शारीरिक संबंध बना लेते हैं तो फिर आपसी रजामंदी और परिवार की सहमति से शादी भी कर लेते हैं। इस परंपरा को घोटुल कहते हैं।
कहां प्रचलित है यह परंपरा
यह परंपरा खास तौर पर छतीसगढ़ के बस्तर इलाके में प्रचलित है। यह प्रथा गोंड आदिवासियों में मुख्य तौर पर प्रचलित है। गोंड आदिवासी जहां भी रहते हैं, वहां यह परंपरा चली आ रही है। इस परंपरा के अनुसार शादी से पहले युवक-युवती एक साथ रहते हैं और शारीरिक संबंध भी बनाते हैं। इसे गोंड जनजाति की पवित्र और शिक्षाप्रद प्रथा माना जाता है। बताया जाता है कि इस प्रथा के चलते यहां आज तक बलात्कार का कोई मामला नहीं आया। जानते हैं इस प्रथा के बारे में।
घोटुल
घोटुल गोंड आदिवासियों के बीच प्रचलित बहुत ही पुरानी प्रथा है। कुछ दूसरे आदिवासी समुदायों के बीच भी यह प्रथा प्रचलित है। दुनिया भर में इस परंपरा को लेकर शोध हो चुके हैं। दरअसल, घोटुल बस्तर के आदिवासियों की समृद्ध परंपरा का एक रूप है, जहां युवक-युवतियां,एक-दूसरे के साथ मिल कर भावी जीवन की रुपरेखा तय करते है। स्थानीय भाषा में इसे चेलिक-मोटियारी कहा जाता है। सूरज ढलने के कुछ ही देर बाद युवक-युवतियां धीरे-धीरे इकट्ठे होने लगते हैं। वे लोकगीत गाते हैं और मांदर की थाप पर थिरकते घोटुल (एक तरह की झोंपड़ी) तक पहुंचते हैं। इसके बाद देर तक गाना-बजाना और नृत्य चलता है। हंसी-ठिठोली और मजाक-मस्ती के बीच अंधेरा घिरते ही युवक-युवतियां जोड़ों में बंट जाते हैं और आपस में बातचीत करने लगते हैं। अगर युवक-युवती के विचार आपस में मेल खाते हैं तो वे जीवनसाथी बनने का निर्णय लेते हैं। लगातार रातभर एक-दूसरे के साथ रहने के कारण घोटुल में ही प्रेमी जोड़े शारीरिक संबंध बना लेते हैं और यौन अनुभव प्राप्त कर लेते है। आगे चल कर यदि कोई युवती गर्भवती हो जाती है, तो उससे उसके साथी का नाम पूछ कर उससे विवाह कर दिया जाता है। घोटुल में छोटी उम्र के लड़के-लडकियां साफ-सफाई, पानी व दूसरी व्यवस्था करने में लगे रहते हैं। आपको बता दें कि घोटुल में आने वाले लड़के को चेलिक और लड़की को मोटियार कहते हैं। यहां आना और कुछ निर्धारित दिन बिताना सब किशोर-किशोरियों के लिए जरूरी माना गया है।
घोटुल में आने की लिए 10 साल की उम्र होना जरूरी
10 साल की उम्र के बाद ही कोई घोटुल में आ सकता है। यहां आने के लिए माता-पिता कभी मना नहीं करते हैं। यहां के नियम कानून भी सख्त होते हैं, जैसे जो युवा घोटुल में नहीं आएगा, उसकी शादी इस जाति में नहीं हो सकती।
क्यों बनाए ऐसे नियम
कहा जाता है कि गोंड जनजाति के देवता माने जाने वाले लिंगो पेन यानी लिंगो देव ने इस प्रथा की शुरुआत की थी। बताया जाता है कि सदियों पहले लिंगो देव ने देखा कि गोंड जाति में किसी भी तरह की शिक्षा का कोई स्थान नहीं है तो उन्होंने यह अनोखी प्रथा शुरू की। इसमें उन्होंने बस्ती के बाहर बांस की कुछ झोंपडि़यां बनवाई और बच्चों को वहां पढ़ाना शुरू कर दिया। यही झोंपडियां बाद में 'घोटुल' के नाम से प्रसिद्ध हुईं। यहां बच्चों को जीवन से जुड़ी हर तरह शिक्षा दी जाती है, जिसमें शादी भी शामिल है।
प्रेमी-प्रेमिका चुनने का अवसर
घोटुल में आये लड़के को किसी लड़की को आकर्षित करने के लिए बांस की एक कंघी बनानी होती है। वह कंघी बनाने में अपनी पूरी ताकत और कला झोंक देता है, क्योंकि यही कंघी तय करती है कि किस लड़की को वह लड़का पसंद आएगा। यदि कोई लड़की कंघी चुरा लेती है तो यह संकेत होता है कि वह उस लड़के को पसंद करती है। इसके बाद वे दोनों घोटुल यानी झोंपड़ी को सजाते-संवारते हैं और वहीं साथ रहने लगते हैं। इस दौरान वे वैवाहिक जीवन से जुड़ी तमाम सीख हासिल करते हैं। इसमें एक-दूसरे की भावनाओं से लेकर शारीरिक जरूरतों को पूरा करना तक शामिल होता है।
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