पटना। बिहार में 243 विधानसभा सीटों के नतीजे आ गए हैं। इस बार नतीजों के आने में समय लगा। एनडीए को बहुमत मिल चुका है। इससे पहले कुछ एग्जिट पोल्स में महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत और कुछ में कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया गया था। हालांकि एग्जिट पोल्स गलत साबित हुए। आइए जानते हैं उन पांच बड़ी वजहों को जो बिहार में सत्ता विरोधी लहर के बावजूद एनडीए की जीत का सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आ रहे हैं। 

बिहार चुनाव: यहां क्लिक कर सीधे चुनाव आयोग से जाने नतीजे 
 

#1. पीएम मोदी का काम 

भले ही एनडीए ने बिहार का चुनाव सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा, लेकिन चुनाव में एनडीए की सबसे बड़ी यूएसपी पीएम नरेंद्र मोदी का नाम, चेहरा और काम रहा। कैम्पेन में यह साफ दिखा भी। एनडीए खासकर बीजेपी ने अपना पूरा अभियान ही पीएम मोदी के नेतृत्व में हुए कामों और फैसलों के इर्द-गिर्द ही फोकस किया। 

लॉकडाउन में गरीबों के लिए फ्री में अनाज, गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा, इलाज और दवाओं में सब्सिडी, जनधन खाते, शौचालय, गरीब और किसानों के लिए पेंशन, उज्ज्वला गैस योजना, पीएम आवास योजना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, पुलवामा के बाद पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक, जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 का खात्मा, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के लिए लोन स्कीम और चीन के साथ विवाद में देश का स्टैंड आदि ऐसे बड़े मुद्दे रहे जिसे मोदी सरकार ने उपलब्धि के तौर पर पेश किया। बिहार की जनता को भी इसका सीधा लाभ मिला और उन्होंने एनडीए के वादों पर भरोसा किया। इन चीजों के अलावा नीतीश के नेतृत्व में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्कूल, रोजगार, कृषि, कानून, सड़क और बिजली को लेकर बिहार में कराए गए काम को प्रमुखता दी गई।

दूसरी ओर महागठबंधन सालों पुराने मुद्दों को लेकर मोदी पर हमले करता रहा। चुनावी वादे तो बहुत किए गए लेकिन यूपीए के दौरान मनरेगा और किसानों की कर्जमाफ़ी जैसे लोकप्रिय मुद्दों को आक्रामक तरीके से भुनाने की कोशिश नहीं हुई। बेहतर तरीके से अगली सरकार का रोडमैप नहीं बताया गया। 

 

#2. आत्मनिर्भर बिहार और डबल इंजन की सरकार का नारा 

चुनाव की घोषणा से पहले ही बीजेपी ने बिहार के लिए आधुनिक विकास का रोडमैप खींचा। कोसी ब्रिज, दरभंगा में एयरपोर्ट की शुरुआत हुई। मत्स और पशुपालन, खेती के लिए सरकार ने कई योजनाओं की घोषणा की। बिहार की कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर योजना के तहत गैस ग्रिड कनेक्टिविटी, रेल सड़क कनेक्टिविटी के लिए कराए गए कामों और भविष्य में आधुनिक विकास के लिए बिहार की ग्लोबल पहचान बनाने का नारा दिया गया। 

मोदी सरकार ने बिहार के लिए करोड़ों के पैकेज का ऐलान किया। केंद्र की कई परियोजनाओं पर बिहार में काम चल रहा है कई पूरी हो गई हैं। यही वजह है कि नीतीश कुमार के खिलाफ थोड़ी सत्ता विरोधी लहर के बावजूद के जनता ने मोदी के आत्मनिर्भर बिहार के नारे और डबल इंजन की सरकार पर भरोसा किया।  

#3. नीतीश की साफ छवि, सिंपैथी वोट 

नीतीश कुमार के हाथ में डेढ़ दशक से बिहार के सरकार की कमान है। हकीकत यह है कि नीतीश के आने के बाद बिहार में जमीनी स्तर पर कई चीजें बदली हैं। लोगों के बीच नीतीश की छवि साफसुथरी और अनुभवी नेता की है। नीतीश के सामने तेजस्वी युवा दावेदार के रूप में कड़ी चुनौती देते जरूर नजर आए, पर आरजेडी की आंतरिक राजनीति से जो मैसेज निकलकर सामने आया वह गलत रहा। मैसेज गया कि तेजस्वी भले मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन सत्ता का नियंत्रण लालू यादव के हाथ में ही रहेगा। 

इस बार कई बाहुबली भी आरजेडी के टिकट पर मैदान में थे। ये वो लोग हैं जिनका अतीत बिहार में काफी विवादित रहा है। राजनीति में बाहुबलियों की फिर से दखल की आशंका में भी नीतीश की छवि कारगर साबित हुई। कैम्पेन के आखिरी दिन नीतीश का "मेरा अंतिम चुनाव" की घोषणा ने भी सिंपैथी दी। आखिरी चरण की सीटों में एनडीए का दबदबा है। 

#4. टीम वर्क और जाइंट कैम्पेन स्ट्रेटजी 

बिहार चुनाव में सबसे अहम रहा एनडीए की ओर से चलाई गई कैम्पेन स्ट्रेटजी। बीजेपी और जेडीयू ने चुनाव की घोषणा से पहले सभी तैयारियां लगभग पूरी कर ली थीं। बस चिराग पासवान के साथ सीटों के समझौते पर पेंच फंसा हुआ था। बीजेपी ने चुनाव की घोषणा से बहुत पहले ही डिजिटल कैम्पेन शुरू कर दिया था। जेडीयू ने भी। एनडीए के कैम्पेन की सबसे खास बात यह थी कि एक स्ट्रेटजी पर टीम वर्क के साथ काम हुआ। एनडीए ने बड़े नेताओं का जमकर इस्तेमाल किया। यहां तक कि कट्टर हिन्दुत्व छवि के लिए मशहूर यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं ने भी जेडीयू और सहयोगियों के लिए रैलियां कीं। एनडीए के सभी नेताओं ने एक-दूसरे के साथ लगातार कैम्पेन चालाया। इंटरनेट माध्यमों का भी जबरदस्त इस्तेमाल हुआ। 

जबकि महागठबंधन का डिजिटल और फिजिकल कैम्पेन बहुत देरी से शुरू हुआ। स्ट्रेटजी का अभाव दिखा और इंटरनेट माध्यमों पर मौजूदगी एनडीए के मुक़ाबले कमज़ोर रही। महागठबंधन में जोरदार जाइंट कैम्पेन स्ट्रेटजी नहीं दिखी। सहयोगी दलों के कई बड़े नेता तो जमीन पर प्रचार करने ही नहीं आए। राहुल गांधी ने मात्र 8 सभाएं कीं। सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, राबड़ी देवी और मीसा भारती ने कैम्पेन ही नहीं किया। तेजप्रताप यादव अपने ही विधानसभा में व्यस्त रहे। तेजस्वी अकेले ही कैम्पेन करते नजर आए। आड़ेबड़े जाइंट कैम्पेन में तो जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार जैसे नेताओं का इस्तेमाल नहीं हुआ। 

#5. विपक्षी मतों में बंटवारा 
एनडीए की जीत में विपक्षी मतों का बंटवारा होना भी एक बड़ा फैक्टर रहा। एनडीए के सामने पांच अहम गठबंधन थे और सभी के निशाने पर नीतीश कुमार थे। उपेंद्र कुशवाहा, बसपा और ओवैसी की तिकड़ी ने सीमांचल समेत कई इलाकों में सीधे महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया और इसका फायदा एनडीए को मिला। इसी तरह पूर्णिया, सहरसा के इलाकों में पप्पू यादव के गठबंधन ने कुछ हद तक यादव मत काटे। घुसपैठ करते हुए एनडीए ने भी यादव समाज को टिकट दिया। नीतीश सरकार के खिलाफ यादव-मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण ही नहीं हो पाया। इसका सीधा-सीधा फायदा एनडीए को मिला।