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वन विभाग में मजदूरी करते थे मां-बाप वहीं IFS अधिकारी बना बेटा, सारी जिंदगी कर दी पेड़-पौधे और जानवरों के नाम

करियर डेस्क. दोस्तों आपने IPS और IAS अफसरों के संघर्ष और सफलता की कहानी खूब सुनी होंगी। पर आज हम आपको वन अधिकारी की कहानी सुनाने जा रहे हैं जिनका जीवन अपने आप में एक प्रेरणा है। ये हैं तमिलनाडु के रहने वाले पी. शिव कुमार। शिवकुमार का बचपन नीलगिरी की पहाड़ियों के बीच गुजरा है। बचपन में वह जंगलों से रंगीन बीज जमा कर, उसे मिट्टी में लगाते थे और पौधे को बड़ा होते देखते थे। उनके माता-पिता, वन विभाग में मजदूरी करते थे। पर आज यही शिव पूरे देश का मान बन गए। साल 2000 में सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल कर, भारतीय वन सेवा से जुड़ गए। 46 वर्षीय शिव आज खुद भी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के फील्ड डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं। आइए उनकी सफलता और वन विभाग के लिए उनके कार्यों के बारे में जानते हैं- 

5 Min read
Author : Asianet News Hindi
Published : Jan 20 2021, 03:05 PM IST
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एक मजदूर बच्चे से अधिकारी बनने का सफर

 

शिव तमिलनाडु के रहने वाले हैं वो पेड़-पौधे के बीच पले-बढ़े हैं। गुजारा करने के लिए उनके मां-पिता वन विभाग में मजदूरी करते थे।  हालांकि  इससे जो कमाई होती थी, उससे घर चलाना मुश्किल होता था। शिव बचपन से ही पौधों से लगाव रखते हैं। इसलिए जब शिव आठवीं कक्षा में थे, अपने घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण, अपनी पढ़ाई छोड़ देना चाहते थे। वो चाहते थे कि वो भी मेहनत मजदूरी करके मां-बाप की मदद करें। वो घर चलाने के लिए पैसा कमाना चाहते थे। पर आज यही शिव एक वन अधिकारी के रूप में देश में सेवाएं दे रहे हैं। शिव का एक मजदूर बच्चे से अधिकारी बनने का सफर संघर्षपूर्ण रहा है।
 

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एक अधिकारी ने दी आगे बढ़ने की हिम्मत

 

द बेटर इंडिया को शिव बताते हैं कि जंगलों की नियमित यात्रा के कारण, उन्हें यहां तमिलनाडु) के वन अधिकारी पहचानने लगे। हम वनों की रक्षा कर रहे अधिकारियों को सलाम करते थे। वे हमें अक्सर चॉकलेट बांटते थे और जंगलों के बारे में और अधिक जानने के लिए प्रेरित करते थे। जब मैंने पढ़ाई छोड़ने की ठान ली तो एक अधिकारी ने मुझे अपने जीवन और माता-पिता को दोष देने के बजाय, जिंदगी में आगे बढ़ने की हिम्मत दी।” 

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ऐसे शुरू हुई UPSC की तैयारी

 

वह कहते हैं, “यह साल 1993 की बात है। पश्चिम बंगाल कैडर के मनोज कुमार को यहाँ भागीय वन अधिकारी (DFO) के रूप में तैनात गया था। उन्होंने जंगलों के प्रति मेरे प्यार को पहचाना और मुझे वन सेवा में शामिल होने की सलाह दी।”

 

पार्ट टाइम जॉब और ट्यूशन पढ़ाकर किया गुजारा

 

अधिकारी मनोज कुमार की सलाह के बाद, शिव ने पार्ट टाइम नौकरी शुरू कर दी, ताकि वह खुद का खर्च निकाल सकें। वह कहते हैं, “अपने माता-पिता को समझाने के बाद, मैंने वन विभाग के फोन बूथ और प्रिंटिंग प्रेस में काम करना शुरू कर दिया। मैं बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता था।”

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साल 2000 में टीचर से अफसर बन गए

 

शिव को एक ट्यूशन सेंटर पर एक स्थायी शिक्षक के रूप में नौकरी मिल गई थी, उन्होंने यहां 5 साल तक नौकरी की। वन महाविद्यालय और अनुसंधान संस्थान, मेट्टुपालयम से मास्टर्स करने के बाद, वह साल 2000 में सिविल सेवा परीक्षा (Civil Services Exam 2000)  में सफलता हासिल कर, भारतीय वन सेवा (Indian Forest Department) से जुड़े।

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सपना हुआ साकार

 

असम कैडर में 2 वर्षों तक एक प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप में काम करने के बाद, शिव को 2002 में तेजपुर में वन सहायक संरक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। तब से, वह कई समुदाय-उन्मुख कार्यक्रमों की अगुवाई कर रहे हैं और पूर्वी घाट में कई स्थानिक प्रजातियों और वन्यजीवों की रक्षा कर रहे हैं।

 

इस क्षेत्र में शिव के उल्लेखनीय योगदानों के लिए विश्व बैंक द्वारा साल 2009 में, उन्हें राष्ट्रीय वानिकी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बाद में, डिगबोई में एक कार्यकाल के दौरान, उन्होंने संरक्षण के लिए 250 किस्म के पौधों को पहचानने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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वह कहते हैं, “हम 165 किस्म के पौधों के साथ, एक नर्सरी बनाने में सफल रहे। इससे वनों के संरक्षण में मदद मिल सकती है। स्थानीय प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के लिए, क्षेत्र में कम से कम 100 पौधों को लगाने की जरूरत है। यदि जंगलों को इसे कोई नुकसान होता है, तो उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए नर्सरी में लगे पौधे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन कार्यों के अलावा, शिव ने एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

 

इसे लेकर वह कहते हैं, “गैंडों के अवैध शिकार के कई मामले सामने आ रहे थे और लओखोवा क्षेत्र से कई जानवर गायब भी हो गए थे। इसके बाद हमने यहाँ काजीरंगा से गैंडों को स्थानांतरित किया। मौजूदा आबादी को बचाने के लिए अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने की जरूरत है।”

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साल 2019 में, उन्हें काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट और फिल्ड डायरेक्टर के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। पिछले 2 वर्षों के दौरान, उन्होंने वन्यजीवों, खास कर, हाथियों, गैंडों और जंगली भैंसों के लिए छह वेटलैंड बनाए हैं।

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मिस्टर काजीरंगा

 

साल 2020 में, स्थानीय लोगों द्वारा शिवकुमार को मिस्टर काजीरंगा की उपाधि दी गई। ऐसा इसलिए कि उन्होंने हैबिटेट को 430 वर्ग किमी से बढ़ाकर 900 वर्ग किमी के दायरे तक विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस तरह, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल, इस उद्यान से तीन और हेबिटेट जुड़ गए। पूर्व में इसे छह बार विस्तारित किया जा चुका है।

 

भविष्य के लिए उनकी योजनाएं

 

शिव कहते हैं कि जानवरों के स्वतंत्र आवागमन के लिए यहां 35 किमी के दायरे में, तीन खंडों में एलिवेटेड रोड बनाए जाएंगे।  वह कहते हैं, वन्यजीवों को कम से कम परेशानी हो, इसके लिए यहाँ वाहनों के आवाजाही पर भी लगाम लगाए जा रहे हैं। पार्क के अंदर वाहनों को ट्रैक करने के लिए सेंसर लगाए गए हैं। शिव कहते हैं कि उनका काम तभी पूरा होगा, जब टेक्नोलॉजी एडवांसमेंट और बेहतर पर्यटन अनुभव के लिए, उनके नए प्रस्तावों को मान लिया जाएगा।

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