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दिल्ली-चंडीगढ़ आधे घंटे का सफर! हवा में दौड़ती है ये हाई स्पीड ट्रेन, बुलेट ट्रेन के बाद है इसकी योजना

First Published Sep 18, 2020, 8:55 AM IST
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नई दिल्ली. बुलेट ट्रेन के बाद मोदी सरकार ने मैग्लेव ट्रेन चलाने की तरफ कदम बढ़ा दिया है। इसके लिए सरकारी कंपनी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL भेल) ने स्विस रैपिड एजी के साथ साझेदारी की है। इस बात की जानकारी खुद बीएचईएल ने दी है। मैग्लेव की बात की जाए तो ये दो शब्दों से मिल बना है, मैग्नेटिक लेवीटेशन यानी चुंबकीय शक्ति से ट्रेन को हवा में ऊपर उठाकर चलाना। 

मैग्नेटिक लेवीटेशन के जरिए ट्रेन चलाने के लिए रेल मंत्रालय ने पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए मैग्लेव ट्रेन सिस्टम की योजना बनाई है। बताया जाता है कि मैग्लेव ट्रेन पटरी पर दौड़ने के बजाय हवा में रहती है। ट्रेन को मैग्नेटिक फील्‍ड की मदद से कंट्रोल किया जाता है। इसलिए उसका पटरी से कोई सीधा संपर्क नहीं होता। 

मैग्नेटिक लेवीटेशन के जरिए ट्रेन चलाने के लिए रेल मंत्रालय ने पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए मैग्लेव ट्रेन सिस्टम की योजना बनाई है। बताया जाता है कि मैग्लेव ट्रेन पटरी पर दौड़ने के बजाय हवा में रहती है। ट्रेन को मैग्नेटिक फील्‍ड की मदद से कंट्रोल किया जाता है। इसलिए उसका पटरी से कोई सीधा संपर्क नहीं होता। 

यही वजह बताई जा रही है कि इससे ऊर्जा की बहुत कम खपत होती है और यह आसानी से 500-800 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि मोदी सरकार बंगलुरु-चेन्नई, हैदराबाद-चेन्नई, दिल्ली-चंडीगढ़ और नागपुर-मुंबई के बीच मैग्लेव ट्रेन चलाने की योजना बना रही है। 

यही वजह बताई जा रही है कि इससे ऊर्जा की बहुत कम खपत होती है और यह आसानी से 500-800 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि मोदी सरकार बंगलुरु-चेन्नई, हैदराबाद-चेन्नई, दिल्ली-चंडीगढ़ और नागपुर-मुंबई के बीच मैग्लेव ट्रेन चलाने की योजना बना रही है। 

दुनियाभर में मैग्लेव ट्रेन की तकनीक चुनिंदा देशों के पास ही है। ये देश हैं, जर्मनी, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूएसए। चीन में शंघाई शहर से शंघाई एयरपोर्ट के बीच मैग्लेव ट्रेन चलती है और ये ट्रैक महज 38 किलोमीटर का है। 

दुनियाभर में मैग्लेव ट्रेन की तकनीक चुनिंदा देशों के पास ही है। ये देश हैं, जर्मनी, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूएसए। चीन में शंघाई शहर से शंघाई एयरपोर्ट के बीच मैग्लेव ट्रेन चलती है और ये ट्रैक महज 38 किलोमीटर का है। 

मैग्लेव तकनीक से ट्रेन चलाने का सपना जर्मनी, यूके और यूएसए जैसे कई देशों ने देखा। लेकिन, तकनीकी कुशलता के बावजूद इसकी लागत और बिजली की खपत को देखते हुए ये सफल नहीं रही। दुनियाभर में कॉमर्शियल तरीके से ये सिर्फ और सिर्फ तीन देशों चीन, दक्षिण कोरिया और जापान में ही चल रही है।

मैग्लेव तकनीक से ट्रेन चलाने का सपना जर्मनी, यूके और यूएसए जैसे कई देशों ने देखा। लेकिन, तकनीकी कुशलता के बावजूद इसकी लागत और बिजली की खपत को देखते हुए ये सफल नहीं रही। दुनियाभर में कॉमर्शियल तरीके से ये सिर्फ और सिर्फ तीन देशों चीन, दक्षिण कोरिया और जापान में ही चल रही है।

भेल ने बताया कि यह समझौता पीएम मोदी के 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को ध्यान में रखकर किया गया है। इस समझौते के बाद अब BHEL स्विस रैपिड एजी के साथ मिलकर इस पर काम करेगी। 

भेल ने बताया कि यह समझौता पीएम मोदी के 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को ध्यान में रखकर किया गया है। इस समझौते के बाद अब BHEL स्विस रैपिड एजी के साथ मिलकर इस पर काम करेगी। 

इससे बीएचईएल दुनिया की अत्याधुनिक इंटरनेशनल टेक्‍नोलॉजी को भारत लाने में मदद मिलेगी और वह भारत में मैग्लेव ट्रेनों का निर्माण करेगी। बीएचईएल पिछले करीब 50 सालों से रेलवे के विकास में साझेदार है। कंपनी ने रेलवे को इलेक्ट्रिक और डीजल लोकोमोटिव की आपूर्ति की है।

इससे बीएचईएल दुनिया की अत्याधुनिक इंटरनेशनल टेक्‍नोलॉजी को भारत लाने में मदद मिलेगी और वह भारत में मैग्लेव ट्रेनों का निर्माण करेगी। बीएचईएल पिछले करीब 50 सालों से रेलवे के विकास में साझेदार है। कंपनी ने रेलवे को इलेक्ट्रिक और डीजल लोकोमोटिव की आपूर्ति की है।

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