बीवी तुम्हारी-बच्चे हमारे...ऐसे बेहूदे और अश्लीलता से भरे हैं 13 फिल्मों के टाइटल
फिल्में चलाने में उसके पोस्टर का बड़ा रोल होता है। पोस्टर यानी फिल्म की थीम को दर्शकों के सामने लाकर उन्हें टीवी या थियेटर तक खींचना। ब्लैक एंड व्हाइट के दौर में फिल्मों के पोस्टर एकदम साफ-सुथरे होते थे। लेकिन जैसे-जैसे फिल्में रंगीन हुई और साथ-साथ उनमें ग्लैमरस का तड़का लगा, पोस्टर भी तड़क-भड़क वाले होते गए। अब बात आती है फिल्मों के टाइटल की। पोस्टरों पर फिल्मों के टाइटल लिखे होते हैं। फिल्मवाले टाइटल ऐसे रजिस्टर्ड कराते हैं, जो अपील करें। लेकिन भोजपुरी सिनेमा ने इस अपील में सेक्स और डबल मीनिंग का तड़का लगा दिया। उसकी देखा-देखी हिंदी सिनेमा भी ऐसा करने लगा है, लेकिन भोजपुरी फिल्मों के टाइटल और पोस्टर तो ऐसे होते हैं कि पढ़ने और देखने वाले मुस्करा दें या झेंप जाएं। देखिए ऐसे ही कुछ पोस्टर...

60 के दशक से भोजपुरी फिल्मों का निर्माण शुरू हुआ था। यहां हर साल करीब 50-60 फिल्में बनती हैं।
भोजपुरी फिल्मों का एक खास दर्शक वर्ग है। ज्यादातर फिल्में उनके लिए ही बनती हैं। भोजपुरी फिल्मों का हिट और पतन का ही एक ही फॉर्मूला है-घिसे-पिटे विषय और डबल मीनिंग संवाद।
भोजपुरी फिल्मों के सफल निर्माता-निर्देशक अभय सिन्हा ने एक मीडिया को बताया था कि यहां बड़े बजट की फिल्में कम बनती हैं। माना जाता है कि 60 में से 10-15 ही बड़े बजट की होती हैं।
अगर भोजपुरी फिल्मों की मेकिंग की बात करें, तो जिनमें बड़ी स्टार कास्ट जैसे-पवन सिंह, खेसारी, दिनेश लाल निरहुआ, रवि किशन, मनोज तिवारी आदि होते हैं, उनकी लागत ढाई करोड़ रुपए तक मानिए। बाकीं तो 50 लाख के अंदर बन रही हैं।
भोजपुरी फिल्मों को बॉलीवुड या साउथ की तर्ज पर उतनी अहमियत नहीं मिलने की एक वजह इनके डबल मीनिंग संवाद और अश्लीलता है।
भोजपुरी फिल्मों का सालाना टर्न ओवर 200 से 250 करोड़ तक माना जाता है। जबकि बॉलीवुड में कई फिल्में ही 100 करोड़ के ऊपर बनी हैं।
भोजपुरी फिल्मों का सबसे बड़ा बाजार बिहार है। इसके अलावा यह सिनेमा उत्तर प्रदेश और नेपाल में भी देखा जाता है।
भोजपुरी फिल्मों पर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए इसे फूहड़ सिनेमा भी कहते हैं।
भोजपुरी की ज्यादातर फिल्में सिर्फ अश्लीलता के कारण कारोबार करती हैं, लेकिन इन्हें फैमिली फिल्म का दर्जा नहीं मिल सका।
फैक्ट: 1960 के दशक में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने बॉलीवुड अभिनेता नाजिर हुसैन से भोजपुरी में एक फिल्म बनाने को कहा था। 1963 में पहली विश्वनाथ शाहाबादी की भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' रिलीज हुई। लेकिन पिछले 2 दशक में भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता की ओर चल पड़ा।
फैक्ट: भारत में सिनेमा
हिंदी फिल्में- 39%
हॉलीवुड फिल्में- 12%
दक्षिण भारत की फिल्में- 42%
अन्य प्रादेशिक फिल्में- 7%
(सोर्स- KPMG, 2019)
फैक्ट: फिल्मी बाजार
हिंदी- 20%
कन्नड़- 14%
तेलगु- 12%
तमिल- 10%
मलयालम- 9%
मराठी- 7%
अन्य प्रादेशिक फिल्में- 25%
(सोर्स- KPMG, 2019)
फिल्मों का गणित: औसतन 10,000 करोड़ सालाना से ऊपर है। इसके जरिये 8 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यहां सालभर में करीब 1800 से ज्यादा फिल्में सालभर में बनती हैं। (सोर्स- KPMG, 2019)
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