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वैक्सीन से कुछ फर्क पड़ता है या नहीं..यह जानना है तो दुनिया के इस देश की तस्वीर और वहां की हालत देखिए

First Published Jan 16, 2021, 2:32 PM IST
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नई दिल्ली. पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से लड़ने की की तैयारी शुरू हो चुकी है। लोगों को कोरोना वैक्सीन दी जानी शुरू हो गई है। इस फेहरिस्त में भारत भी शामिल हो गया है। 16 जनवरी से कोरोना वैक्सीनेशन प्रोग्राम की शुरुआत भारत में शुरू हो चुकी है। इससे पहले कई देशों में भी वैक्सीन देने का काम जारी है। इस लिस्ट में इजराइल सबसे आगे है। इजरायल को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वैक्सीनेशन के बाद वहां करोना संक्रमण पर कितना असर पड़ सकता है और आगे क्या हो सकता है?

इजराइल का वैक्सीनेशन अभियान पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण के रूप में हैं। इजराइल में वैक्सीनेशन का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है। यहां वैक्सीनेशन की रफ्तार देखकर कुछ देशों ने इसकी आलोचना भी की थी, लेकिन इसका शुरुआती डेटा काफी सकारात्मक है। 

इजराइल का वैक्सीनेशन अभियान पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण के रूप में हैं। इजराइल में वैक्सीनेशन का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है। यहां वैक्सीनेशन की रफ्तार देखकर कुछ देशों ने इसकी आलोचना भी की थी, लेकिन इसका शुरुआती डेटा काफी सकारात्मक है। 

इजराइल की मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यहां के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वैक्सीन की पहली डोज के 14 दिनों के बाद ही संक्रमण का खतरा 50 फीसदी तक कम पाया गया है। हालांकि, कई हेल्थकेयर एजेंसीज ने इसके अलग-अलग आंकड़े दिए हैं। 

इजराइल की मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यहां के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वैक्सीन की पहली डोज के 14 दिनों के बाद ही संक्रमण का खतरा 50 फीसदी तक कम पाया गया है। हालांकि, कई हेल्थकेयर एजेंसीज ने इसके अलग-अलग आंकड़े दिए हैं। 

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से अलग हेल्थ केयर प्रोवाइडर मैक्काबी के अनुसार मीडिया रिपोर्ट्स में वैक्सीन से 60 फीसदी तो क्लैट ने 14 दिनों के अंगर इंफेक्शन दर में 33 फीसदी की कमी बताई जा रही है। 

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से अलग हेल्थ केयर प्रोवाइडर मैक्काबी के अनुसार मीडिया रिपोर्ट्स में वैक्सीन से 60 फीसदी तो क्लैट ने 14 दिनों के अंगर इंफेक्शन दर में 33 फीसदी की कमी बताई जा रही है। 

क्लैट की तुलना में मैक्काबी के डेट का ज्यादा भरोसेमंद माना जा रहा है, क्योंकि मैक्काबी की स्टडी के अनुसार कहा जा रहा है कि वैक्सीन लेने वाले सभी उम्र के लोगों को शामिल किया गया था, जबकि क्लैट की स्टडी सिर्फ बुजुर्गों पर की गई थी। 
 

क्लैट की तुलना में मैक्काबी के डेट का ज्यादा भरोसेमंद माना जा रहा है, क्योंकि मैक्काबी की स्टडी के अनुसार कहा जा रहा है कि वैक्सीन लेने वाले सभी उम्र के लोगों को शामिल किया गया था, जबकि क्लैट की स्टडी सिर्फ बुजुर्गों पर की गई थी। 
 

बता दें कि इजराइल में लोगों को फाइजर वैक्सीन दी जा रही है। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन की पहली डोज लेने के कितने दिनों के बाद इम्यूनिटी बनती है।

बता दें कि इजराइल में लोगों को फाइजर वैक्सीन दी जा रही है। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन की पहली डोज लेने के कितने दिनों के बाद इम्यूनिटी बनती है।

प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट रिव्का अबुलाफिया ने इजराइल की मीडिया से बातचीत में बताया था कि वैक्सीन लेने वालों का आंकड़ा आखिर इतनी जल्दी कैसे पा लिया। उन्होंने इसका पूरा श्रेय वहां के हेल्थ केयर सिस्टम को दिया है। 

प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट रिव्का अबुलाफिया ने इजराइल की मीडिया से बातचीत में बताया था कि वैक्सीन लेने वालों का आंकड़ा आखिर इतनी जल्दी कैसे पा लिया। उन्होंने इसका पूरा श्रेय वहां के हेल्थ केयर सिस्टम को दिया है। 

अबुलाफिया के हवाले से कहा जा रहा है कि 'इजरायल में हर किसी का हेल्थ मेंटिनेंस ऑर्गेनाइजेशन (HMO) में रजिस्ट्रेशन है। इसमें उनके बैकग्राउंड का पूरा रिकर्ड रहता है। वैक्सीन लगाने के बाद उनके उम्र, लिंग और मेडिकल कंडीशन समेत हर चीज की सही जानकारी यहां से मिलती है।'

अबुलाफिया के हवाले से कहा जा रहा है कि 'इजरायल में हर किसी का हेल्थ मेंटिनेंस ऑर्गेनाइजेशन (HMO) में रजिस्ट्रेशन है। इसमें उनके बैकग्राउंड का पूरा रिकर्ड रहता है। वैक्सीन लगाने के बाद उनके उम्र, लिंग और मेडिकल कंडीशन समेत हर चीज की सही जानकारी यहां से मिलती है।'

इजराइल का वैक्सीनेशन को लेकर उद्देश्य है कि फरवरी महीने तक देश के सभी बुजुर्गों को वैक्सीन लगा देना है। इससे ये साफ है कि इजराइल के डेटा से पूरी दुनिया को जानकारी मिल सकेगी कि ये वैक्सीन बुजुर्गों पर कैसा असर करती है।

इजराइल का वैक्सीनेशन को लेकर उद्देश्य है कि फरवरी महीने तक देश के सभी बुजुर्गों को वैक्सीन लगा देना है। इससे ये साफ है कि इजराइल के डेटा से पूरी दुनिया को जानकारी मिल सकेगी कि ये वैक्सीन बुजुर्गों पर कैसा असर करती है।

फोटो सोर्स- गूगल।

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