झारखंड की सियासत बेताज बादशाह कहे जाने वाले शिबू सोरेन अपने बेटे हेमंत सोरेन को सत्ता के सिंहासन पर एक बार फिर बैठता हुआ देखना चाहते हैं 

रांची: झारखंड की सियासत बेताज बादशाह कहे जाने वाले शिबू सोरेन अपने बेटे हेमंत सोरेन को सत्ता के सिंहासन पर एक बार फिर बैठता हुआ देखना चाहते हैं। शिबू सोरेन के नाम के बिना झारखंड की राजनीति असंभव है। शिबू सोरेन पिता की मौत के बाद संघर्ष का रास्ता चुना और झारखंड में आदिवासियों को महाजनों से मुक्ति दिलानाकर एक मसीहा के तौर पर उभरे, जिसके बाद गुरुजी के नाम से मशहूर हुए हालांकि उन्हें झारखंडा का गांधी भी कहा जाता है।

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बता दें कि शिबू सोरेन के पिता सोबरन मांझी की हत्या महाजनों ने कर दी थी, उस वक्त शिबू सोरेन आदिवासी छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। पिता की हत्या के बाद ही शिबू ने संघर्ष का रास्ता चुना। लकड़ी बेचकर परिवार पाला और महाजन प्रथा के खिलाफ धान काटो अभियान चलाया। शिबू के तेवरों को देख संताल के लोगों को विश्वास हुआ कि वह ही उन्हें महाजनों से मुक्ति दिला सकते है। आदिवासी समाज के लोगों ने उन्हें दिशोम गुरु यानी दशों दिशाओं का गुरु कहना शुरू कर दिया। यही से शिबू सोरेन गुरु जी के नाम से पहचाने जाने लगे।

शिबू सोरेन का सियासी सफऱ

शिबू सोरेन के 1970 में आदिवासियों के नेता के तौर पर सियासत में कदम रखा। 1975 में गैर-आदिवासी लोगों को झारखंड से निकालने का आंदोलन छेड़ा। इसे आदिवासियों के बीच उनकी पकड़ जबरदस्त तरीके से हुई। 1980 में पहली बार लोकसभा सांसद चुने गए इसके बाद पलटकर नहीं देखा। 1989 से 2014 तक सांसद बने 2002 में राज्यसभा के सदस्य चुने गए, इसी साल इस्तीफा देकर दुमका से लोकसभा का उपचुनाव जीता था। झारखंड के 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन महज 10 दिने के लिए इसके बाद दूसरी बार शिबू सोरेन ने 2008 में झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उपचुनाव हार गए. इसके बाद तीसरी बार 2009 में पांच महीने के लिए सीएम चुने गए।

सीएम रहते हार गए थे चुनाव

शिबू सोरेन देश के एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा चुनाव हार गए थे। अगस्त 2008 को शिबू सोरेन ने झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, उस वक्त वे लोकसभा सांसद थे इसके बाद उन्होंने तमाड़ सीट से विधानसभा का उपचुनाव लड़ा शिबू के खिलाफ झारखंड पार्टी ने राजा पीटर को मैदान में उतारा था इस उपचुनाव में राजा पीटर ने शिबू सोरेन को करारी मात दी थी, जिसके चलते उन्हें सीएम पद छोड़ना पड़ा था। 

ऐसे शिबू सोरेन बनाई थी जेएमएम

झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की नींव 70 के दशक में पड़ी थी। बिहार से अलग झारखंड राज्य के मुद्दे पर जयपाल सिंह मुंडा अपनी झारखंड पार्टी और बनाई। झारखंड पार्टी के जरिए आंदोलन चलाया था, लेकिन बाद में पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। इसके बाद शिबू सोरेन ने 1973 को जेएमएम का गठन किया। पार्टी के पहले अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो चुने गए और शिबू सोरेन महासचिव बने।

90 के दशक में जेएमएम बिखराव हुआ और शिबू सोरेन पार्टी के 10 विधायक व चार सांसदों के साथ, जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व कर रहे कृष्णा मार्डी दो सांसद व नौ विधायक के साथ अलग हो गए। 1999 में पार्टी के कुछ नेताओं के पहल पर झामुमो फिर से एक हो गया।

विवादों से भरा रहा राजनीतिक जीवन

1975 में शिबू सोरने ने जामताड़ा जिले के चिरूडीह गांव में "बाहरी" लोगों बाहर को खदेड़ने के लिए आंदोलन चलाया आंदोलन में 11 लोग मारे गए थे। इसके शिबू सोरेन का सीधा नाम आया था। इसके अलावा अपने सचिव के अपहरण और हत्या का आरोप लगा था, जिसे में शिबू सोरेन को 2006 में कोर्ट ने दोषी करार दिया है। हालांकि बाद में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। यह मामला उनके पूर्व सचिव शशिनाथ झा के अपहरण और हत्या का था आरोप था कि शशिकांत का दिल्ली से अपहरण कर रांची में मर्डर किया गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में शिबू समेत पांचों दोषियों को 22 अगस्त 2007 को दोषमुक्त करार दिया था।

(फाइल फोटो)