अजीत दादा पवार का अंतिम संस्कार बारामती में पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुआ। परिवार, बड़े नेता, जनसैलाब, मुखाग्नि और उत्तराधिकारी को लेकर क्या संकेत मिले? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
28 जनवरी 2026… एक चार्टर्ड विमान हादसा और महाराष्ट्र ने अपना ‘दादा’ खो दिया। अजीत पवार का अचानक जाना राज्य को स्तब्ध कर गया। चाहने वालों की गीली आंखें और जुबा पर दादा का नाम था।
29 जनवरी को बारामती की सड़कों पर सिर्फ भीड़ नहीं थी, हर चेहरे पर ग़म था। वही मिट्टी आज अपने सबसे बड़े नेता को विदा कर रही थी।
तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर, गार्ड ऑफ ऑनर और गूंजते नारे-“अजीत दादा अमर रहें”, लेकिन आंखें बार-बार भर आ रही थीं। छोटे बेटे जय पवार सिर्फ हाथ जोड़े पिता की ओर निहारते रहे।
अजीत पवार की पत्नी व राज्यसभा सांसद पत्नी सुनेत्रा पवार, बेटे पार्थ और जय, मां आशा पवार-हर चेहरा कह रहा था कि यह सिर्फ नेता नहीं, परिवार का सहारा था। हर की जुबां खामोश थी।
एनसीपी प्रमुख अजीत पवार को उनके दोनों बेटों पार्थ और जय पवार ने एकसाथ पिता को मुखाग्नि दी। उस पल लगा जैसे महाराष्ट्र की राजनीति का एक अध्याय खत्म हो गया।
अजीत पवार की चिता में आग लगाने के बाद दोनों बेटों पार्थ और जय पवार ने वहां मौजूद जनसमूह का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और मुर्झाए चेहरे से सभी का शुक्रिया अदा किया।
अजीत पवार के बड़े बेटे पार्थ पवार को यूं तो उनका राजनीतिक वारिस माना जा रहा है, उन्होंने अंतिम संस्कार के दौरान बड़े होने का फर्ज निभाया। छोटे भाई जय, मां और बुआ को संभालते दिखे।
अमित शाह, नितिन गडकरी, शरद पवार, सुप्रिया सुले देवेंद्र फडणवीश, एकनाथ शिंदे, भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन, उद्धव ठाकरे-सत्ता और विपक्ष दोनों ने एक नेता को अंतिम सलाम किया।
किसान, युवा, ग्रामीण इलाक़े-हर वर्ग ने उन्हें काम से पहचाना। उनकी तेज़ रफ्तार ने उन्हें ‘विकास पुरुष’ बनाया।
अजीत दादा अपनी कड़क आवाज़ और साफ़ फैसले के लिए जाने जाते थे। जो गैरों के लिए खामियां, समर्थकों के लिए ईमानदारी की पहचान मानी जाती थी।
एक कस्बे को एजुकेशन और इंडस्ट्रियल हब बनाना-‘बारामती मॉडल’ उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत है।
अजीत पवार के जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनकी राजनीतिक विरासत का असली वारिस कौन बनेगा। बेटे पार्थ पवार, सुनेत्रा पवार या कोई वरिष्ठ नेता-NCP की बागडोर पर सस्पेंस गहरा है।
शरद पवार की डबडबाई आंखें और सुनेत्रा पवार की खामोशी-यह खालीपन भरना आसान नहीं होगा।
अजीत पवार चले गए, लेकिन उनके फैसले, उनका काम और उनकी बेबाक शैली महाराष्ट्र की राजनीति में हमेशा ज़िंदा रहेगी।