हिमाचल प्रदेश में है घटोत्कच की माता का मंदिर, यहां कभी थी बलि की परंपरा, आज भी दिखते हैं जानवरों के सींग

Published : Mar 11, 2022, 11:26 AM IST
हिमाचल प्रदेश में है घटोत्कच की माता का मंदिर, यहां कभी थी बलि की परंपरा, आज भी दिखते हैं जानवरों के सींग

सार

भारत में अनेक प्राचीन मंदिर हैं, जिनसे कोई-न-कोई खास मान्यता जुड़ी है। ऐसा ही एक मंदिर हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के मनाली (Manali) में भी है। ये मंदिर किसी देवी-देवता का नहीं बल्कि एक राक्षसी का है, लेकिन यहां इन्हें देवताओं की तरह ही पूजा जाता है। ये मंदिर है देवी हिडिंबा (Hidimba Temple) का।

उज्जैन. हिडिंबा का वर्णन महाभारत (Mahabharata) में मिलता है। ये राक्षस कुल की थीं। इनका विवाह पांडु पुत्र भीम से हुआ था। घटोत्कच (Ghatotkach) इन्हीं का पुत्र था। देवी हिडिंबा ( को मनाली की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। मनाली के डूंगरी वन विहार में स्थित इनका मंदिर काफी प्राचीन है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। हिडिंबा देवी का मंदिर डूंगरी गाँव में स्थित है। इसी कारण हिडिंबा देवी को डूंगरी देवी भी कहा जाता है। मंदिर में कभी जानवरों की बलि दी जाती थी, लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया है। लेकिन आज भी मंदिर की दीवारों पर सैकड़ों जानवरों के सींग लटके हुए हैं।

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ये है इससे जुड़ी कथा
हिडिंबा अपने भाई हिडिंब के साथ वन में रहती थी। वनवास के दौरान जब पांडव यहां आए तो भीम ने हिडिंब को एक वध कर दिया। भीम से प्रभावित होकर हिडिंबा ने उनसे विवाह कर लिया। हिडिंबा ने भीम के पुत्र घटोत्कच को जन्म दिया जो कालांतर में उस वनीय क्षेत्र का राजा बना। कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध के दौरान घटोत्कच कर्ण के हाथों मारा गया। बाद में हिंडिबा ने इस स्थान पर आकर शरण ली और तपस्या करते हुए देवत्व प्राप्त किया।

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ऐसा है मंदिर का स्वरूप
- किसी काल में यह हिडिंबा मंदिर भी एक गुफा मंदिर रहा होगा, जैसा कि पहाड़ी पर स्थित अधिकतर देवी मंदिर हैं। वर्तमान में उपस्थित यह हिडिंबा मंदिर एक गुफा के चारों ओर निर्मित है। 
- इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है बल्कि हिडिम्बा देवी मंदिर में हिडिम्बा देवी के पदचिह्नों की पूजा की जाती है। मंदिर के प्रवेशद्वार के समीप लगी लकड़ी की पट्टिका पर लिखे अभिलेख के अनुसार वर्तमान मंदिर का निर्माण सन् 1553 में राजा बहादुर सिंह ने करवाया था। 
- इसकी संरचना मंदिर वास्तुकला की ठेठ काठकोणी शैली में की गई है, जो पहाड़ी क्षेत्रों की प्रचलित शैली है। मंदिर का निर्माण करने के लिए क्रमशः पत्थर एवं लकड़ी की परतों को अदल-बदल कर लगाया गया है। मंदिर की छत तीन परतों की है तथा इसके शीर्ष पर पीतल धातु में निर्मित शुंडाकार शिखर है। 

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कैसे पहुंचें?
कुल्लू और मनाली दोनों स्थान राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 21 पर स्थित हैं। यहां की नियमित बस सेवाएं कुल्लू और मनाली को हिमाचल प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के अधिकांश महत्वपूर्ण स्थानों से जोड़ती हैं। सड़क मार्ग से दिल्ली से मनाली की दूरी 570 किमी है और शिमला से यह दूरी 280 किमी है। वोल्वो नाइटबस दिल्ली से मनाली 14 घंटे में पहुंचा देती है।आप अपनी सुविधानुसार बस से यहां आ सकते हैं।

 

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