
एंटरटेनमेंट डेस्क. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और नेशनल क्रश रश्मिका मंदाना जब एक ही फ्रेम में नजर आएंगे तो इस फिल्म को देखना का मन तो हर किसी का करेगा पर क्या यह फिल्म वाकई में आपकी कीमती वक्त डिजर्व करती हैं या इसे देखकर आप पछताने वाले हैं। यह जानने के लिए पढ़िए यह मूवी रिव्यू...
| रेटिंग | 3/5 |
| डायरेक्टर | विकास बहल |
| स्टार कास्ट | अमिताभ बच्चन, नीना गुप्ता, रश्मिका मंदाना, सुनील ग्रोवर आदि |
| प्रोड्यूसर | शोभा कपूर, एकता कपूर, विकास बहल आदि |
| म्यूजिक डायरेक्टर | अमित त्रिवेदी |
| जोनर | फैमिली कॉमेडी ड्रामा |
कहानी
कहानी एक ऐसे कपल हरीश (अमिताभ बच्चन) और गायत्री (नीना गुप्ता) की है जिनके चार बच्चे (रश्मिका मंदाना, पावेल गुलाटी, अभिषेक खान और साहिल मेहता) दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए हैं। अचानक से एक दिन मां का निधन हो जाता है और अब शुरू होता है रीति-रिवाज को लेकर बाप-बेटी और बाकी बच्चों के बीच टकराव। एक बेटी है जो मॉडर्न है और रीति रिवाजों पर सवाल उठाती है। एक लड़का है जो अपनी मां के अंतिम संस्कार के बाद क्रिया कर्म के तौर पर अपने बाल भी नहीं कटवाना चाहता है। एक बेटा है जो अपनी मां के क्रिया क्रम के बाद भी सेक्स करता है। सवाल यह है कि अब जब इस परिवार को जोड़कर रखने वाली मां नहीं रही तो यह परिवार वापस जुड़ेगा कैसे? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
एक्टिंग
एक्टिंग के मामले में अमिताभ बच्चन ने फिल्म की जड़ें पकड़ कर रखी हैं। हालांकि, फिल्म में अमिताभ ने जो कुछ भी किया है वो सब वे इससे पहले भी अपनी कई फिल्मों में कर चुके हैं। हालांकि, अस्थि विसर्जन के बाद वाले दृश्य में उनका काम देखकर अचंभा होता है। वहीं रश्मिका मंदाना की एक्टिंग अच्छी है पर उनका किरदार जितने अच्छे से लिखा होना चाहिए था उतने अच्छे से लिखा नहीं गया। फिर भी उन्होंने अपने एंड से बेस्ट दिया है। नीना गुप्ता का काम लाजवाब है। वो आपकाे हंसाएंगी भी और रुलाएंगी भी। इसके अलावा आशीष विद्यार्थी और सुनील ग्रोवर अपना-अपना काम ढंग से निभा जाते हैं। बाकी कलाकारों का अभिनय ओके-ओके है।
निर्देशन
'क्वीन' और 'सुपर 30' जैसी कमाल की फिल्में बनाने वाले विकास बहल यहां कई मामलों में चूक गए। अमिताभ बच्चन, रश्मिका मंदाना, नीना गुप्ता, सुनील ग्रोवर, पावैल गुलाटी और आशीष विद्यार्थी जैसे बड़े कलाकारों का साथ पाकर उन्होंने फिल्म तो संभाल ली पर कहानी नहीं संभाल पाए। अच्छी कहानी और अच्छा ट्रैक पकड़ने के बाद भी विकास कहीं-कही भटक जाते हैं। इस फिल्म के साथ, विकास हमें इमोशनल राइड पर ले जायेंगे। पहले 20-25 मिनट में ही आपकी आंखों से आंसू छलकने लगेंगे। फिल्म में इमोशंस भी हैं और कॉमेडी पर कुछ जगहों पर जो कन्फ्यूजन होते हैं उन्हें फिल्म के अंत तक क्लीयर नहीं किया गया।
म्यूजिक
अमित त्रिवेदी ने कमाल का संगीत दिया है। फिल्म का गाना 'जयकाल महाकाल' पहले से ही सबका फेवरेट बना हुआ है। सुधाकर रेड्डी की सिनेमाटोग्राफी बढ़िया है।
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