
एंटरटेनमेंट डेस्क. विद्युत जामवाल और शिवालिका ओबेरॉय स्टारर फिल्म 'खुदा हाफिज 2: अग्निपरीक्षा' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म अपने इमोशंस और विद्युत के एक्शन के दम पर एक सामाजिक मुद्दा उठाने की कोशिश करती है। एक आम आदमी को एक बार यह फिल्म जरूर देखनी भी चाहिए क्योंकि यह एक बहुत ही जरूरी मैसेज भी देती है पर मैसेज को दर्शकों तक पहुंचाया कैसे जाता है, वह तरीका हमेशा मायने रखता है। खैर, इस खबर में हम आपको फिल्म के कुछ खास डॉयलॉग्स के साथ-साथ यह भी बताएंगे कि इस फिल्म को क्यों देखें और क्यों नहीं...
प्लस पॉइंट्स - एक्शन सीक्वेंसेज और सोशल मैसेज
1. अगर आप विद्युत जामवाल की फिल्म देखने जा रहे हैं तो आप पहले से ही दमदार एक्शन सीक्वेंस देखने के लिए तैयार होते हैं और इस मामले में यह फिल्म आपको निराश नहीं करती। विद्युत जहां एक्शन करने उतरते हैं वहीं से इस फिल्म में मजा आना शुरू होता है। हां बस इस तरह के दृश्यों के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ता है। इन सीन्स में जामवाल ने हमेशा की तरह अपना बेस्ट दिया है।
2. चाहे जेल के बाथरूम और खुले मैदान में लड़ने वाला सीक्वेंस हो या फिर शहर की पतली-पतली गलियों का एक्शन सीक्वेंस हो। इन सीन्स को अलग ही लेवल पर शूट किया गया है। विद्युत के एक्शन सीन्स में जबरदस्त कैमरा वर्क के जरिए चार चांद लगाए गए हैं।
3. फिल्म में एक सीन है जहां बैकग्राउंड में राजेश तैलंग की वॉइस चलती है। इस सीन में काफी दमदार डायलॉग बोले जाते हैं और फिल्म के जरिए निर्देशक जो एक बेहतर देश बनाने का संदेश देना चाहते हैं वो इसी सीन में समझ आता है।
4. शीबा चड्ढा ने यहां कुछ नया ट्राय किया है और वे हमेशा की तरह जबरदस्त नजर आई हैं। राजेश तैलंग अपने काम को बखूबी पूरा करते हैं और अपने डायलॉग्स के जरिए आपको बार-बार झकझोरते हैं। दिव्येंदु भट्टाचार्य का इंट्रो सीन काफी प्रोमिसिंग था।
माइनस पॉइंट्स: स्लो फर्स्ट हाफ और थोड़ी सी प्रिडिक्टेबल स्टोरी
1. फिल्म के एक्शन सीन्स अच्छे तो हैं पर काफी वीभत्स भी हैं। ऐसे में कमजोर दिल वाले इन्हें न देखें। साथ ही फैमिली के साथ फिल्म देखना का प्लान कर रहे हैं तो एक बार सोच लें कि आप अपने बच्चों को किस लेवल तक वॉयलेंस दिखा सकते हैं।
2. किसी भी फिल्म का शुरुआती आधा घंटा बहुत महत्वपूर्ण होता है। कई बार यही आधा घंटा दर्शकों के मन में एक इमेज बना देता है कि आगे जाकर फिल्म कैसी होगी। इस फिल्म का शुरुआती आधा घंटा काफी स्लो स्पीड से चलता है। इस दौरान कुछ बेवजह के सीन्स भी दिखाए गए हैं जो न भी होते तो फिल्म की कहानी पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
3. मेकर्स के पास शीबा चड्ढा और दिव्येंदु भट्टाचार्य जैसे कमाल के एक्टर्स थे पर दोनों को यहां कुछ खास करने नहीं दिया गया। या फिर यूं कहें कि दोनों एडिटिंग के शिकार हुए हैं। जहां एक ओर शीबा के किरदार को और डेवलप करके भय बनाया जा सकता था। वहीं दिव्येंदु को कुछ और बेहतर डायलॉग्स दिए जा सकते थे।
4. स्टोरी को जबरदस्ती खींचना कई बार एक फिल्म को बेहतर होकर भी बकवास बना देती है। ऐसा इस फिल्म को देखते वक्त कई बार महसूस हुआ पर सही वक्त पर फिल्म प्लॉट पर लौट आई। जैसे, फिल्म का फर्स्ट हाफ स्लो है पर वक्त के साथ फिल्म रफ्तार पकड़ लेती है। कहानी को थोड़ा और अनप्रिडिक्टेबल बनाया जा सकता था।
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