
मुंबई. 'सिलसिला', 'चांदनी, 'डर और 'लम्हे' जैसी सदाबहार फिल्मों में संगीत देने वाली शिव-हरि जोड़ी फेम पंडित शिवकुमार शर्मा (Pandit Shivkumar Sharma) बॉलीवुड के सबसे पॉपुलर संगीतकारों में से एक थे। लेकिन क्या जानते हैं कि पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी जैसे अलंकरणों से सम्मानित पंडित शिवकुमार शर्मा ने वह दिन भी देखें हैं, जब उनकी जेब में सिर्फ एक आना था और उनके पास खाने के लिए भी कुछ नहीं था। इस बात का खुलासा खुद शिवकुमार जी ने एक इंटरव्यू में किया था।
18 की उम्र में दिया पहला संगीत
पंडित शिवकुमार शर्मा तब महज 18 साल के थे, जब वे मुंबई में आयोजित हरिदास संगीत सम्मान में संतूर बजाने के लिए आए थे। उनका संगीत डायरेक्टर वी. शांताराम को इतना पसंद आया कि उन्होंने उन्हें अपनी फिल्म 'झनक झनक पायल बाजे' में संगीत देने का ऑफर दे दिया। शिवकुमार जी ने फिल्म के एक सीन में बैकग्राउंड म्यूजिक दिया था। इसके बाद वी. शांताराम ने उन्हें दूसरी फिल्म 'तूफ़ान और दीया' ऑफर की, लेकिन उन्होंने पढ़ाई पूरी करने का हवाला दिया और ऑफर ठुकराकर जम्मू वापस लौट गए।
जल्दी ही फिर लौट आए मुंबई
पंडित शिवकुमार शर्मा के मुताबिक, उनके पिता उमा दत्त शर्मा उनका भविष्य सुरक्षित करने के लिए जम्मू और श्रीनगर रेडियो में सरकारी नौकरी पर लगवाना चाहते थे। लेकिन खुद शिवकुमार कुछ और चाहते थे। इस बात पर बाप-बेटे में बहस हुई और शिवकुमार अपना संतूर और जेब में मात्र 500 रुपए लिए घर छोड़कर मुंबई आ गए।
शिवकुमार ने बताया था, "मुंबई आकर मैंने काम तलाशना शुरू किया। ऐसे दिन भी आ गए कि मेरे जेब में मात्र एक आना बचा और मेरे पास खाने को कुछ नहीं था। मैंने दूसरों का साथ देने के लिए तबला बजाय। संतूर की निगेटिव आलोचना के कारण कॉन्सर्ट मिलना मुश्किल थे। निम्न स्तर के फिल्म असाइंमेंट ने मुझे वहां बनाए रकने में मदद की।
'सिलसिला' से बनी शिव-हरि की जोड़ी
शिवकुमार जी के मुताबिक, बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया (Hariprasad Chaurasia) और वह यश चोपड़ा को जानते थे। उनके मुताबिक, 1981 में जब यश चोपड़ा ने उन्हें 'सिलसिला' ऑफर की तो वे खुद भी नहीं जानते थे कि इसका संगीत इस कदर हिट साबित होगा। बाद में उन्होंने यश जी के साथ 'फासले', 'विजय', 'चांदनी', 'लम्हे', 'साहिबान' और डर' में काम किया।
1993 में फिल्मों से किनारा कर लिया
पंडित शिवकुमार शर्मा ने 1993 के बाद किसी के साथ कोई फिल्म नहीं की। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं, "फिल्म का संगीत ज्यादातर मेकर्स की सोच और टेस्ट पर बनता है। आज के संगीत में पश्चिम का ज्यादा प्रभाव है, इसलिए शोर ज्यादा है। यही समस्या है। आज काम करने के लिए सही निर्देशक कहां हैं?"
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