Budget History: 1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट से जुड़ी कुछ दिलचस्प और अनोखी बातें यहां बताई गई हैं। इस बार का केंद्रीय बजट 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पेश करेंगी।
अंग्रेजों के जमाने में बजट शाम 5 बजे पेश होता था। क्योंकि तब लंदन में सुबह के 11.30 बज रहे होते थे। 1999 तक यह परंपरा चली, फिर 2001 में यशवंत सिन्हा ने इसे सुबह 11 बजे कर दिया।
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राष्ट्रपति भवन में छपता था बजट
1950 से पहले बजट राष्ट्रपति भवन में छपता था। लेकिन उसी साल बजट लीक हो गया। तब से, बजट नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में एक सीक्रेट बंकर में छपता है। इसमें शामिल 100 लोग 10 दिन तक दुनिया से कटे रहते हैं।
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क्यों बनता है हलवा?
बजट से पहले हलवा क्यों बनता है? दरअसल, शुभ काम की शुरुआत मीठे से करने की भारतीय परंपरा है। बजट छपाई से पहले वित्त मंत्रालय में हलवा बनता है, जिसे वित्त मंत्री खुद परोसते हैं।
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800 शब्दों का सबसे छोटा बजट भाषण
1977 में वित्त मंत्री हीरूभाई पटेल ने सिर्फ 800 शब्दों का सबसे छोटा बजट भाषण दिया था। वहीं, सबसे लंबा बजट भाषण 2020 में निर्मला सीतारमण ने दिया, जो 2 घंटे 42 मिनट तक चला था।
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अजीब टैक्स की परंपरा
आजादी के बाद 10 साल तक भारतीयों पर अजीब टैक्स लगे। जैसे- क्रॉसवर्ड, पहेली या किसी प्रतियोगिता में जीते गए इनाम पर टैक्स, गिफ्ट टैक्स और खर्च पर टैक्स। इनमें से कुछ आज भी लागू हैं।
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ब्रीफकेस वाला बजट हो गया डिजिटल
2018 तक, बजट एक ब्रीफकेस में आता था, जो ब्रिटिश परंपरा थी। 2019 में, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस परंपरा को खत्म कर पारंपरिक 'बही-खाते' की शुरुआत की।
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कब पेश हुआ था भारत का पहला बजट?
भारत का पहला बजट 7 अप्रैल, 1860 को पेश किया गया था। इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के जेम्स विल्सन ने पेश किया था। इसका मकसद 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश खजाने को भरना था।
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जब सिर्फ अमीरों पर लगा था टैक्स
आजादी से पहले, लियाकत अली खान ने 'गरीब आदमी का बजट' पेश किया था। इसमें अमीरों पर टैक्स लगाया गया था। बंटवारे के बाद, लियाकत अली खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने।
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3 प्रधानमंत्री पेश कर चुके हैं देश का बजट
भारत के इतिहास में तीन बार प्रधानमंत्रियों ने बजट पेश किया है। 1958 में जवाहरलाल नेहरू, 1970 में इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए बजट पेश किया था।
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बजट में जब खत्म हो गई 92 साल पुरानी परंपरा
पहले रेल बजट अलग से पेश होता था। 92 साल पुरानी यह परंपरा 1924 में शुरू हुई थी। 2017 में, अरुण जेटली ने इसे आम बजट में मिला दिया और यह परंपरा खत्म हो गई।
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