
मुंबई: सरकार द्वारा वसूले जाने वाले एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) की वजह से भारत की कई टेलीकॉम कंपनियां बर्बादी की कगार पर पहुंच गई हैं। वोडाफोन आइडिया को इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारतीय कॉरपोरेट इतिहास का सबसे ज्यादा 50,921 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ है। तीसरी तिमाही में भी उसे 6,438 करोड़ का घाटा हुआ है।
क्या है AGR
एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा टेलीकॉम कंपनियों से लिया जाने वाला यूजेज और लाइसेंसिग फीस है। इसके दो हिस्से होते हैं- स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज और लाइसेंसिंग फीस, जो क्रमश 3-5 फीसदी और 8 फीसदी होता है। आपको बता दें कि टेलिकॉम कंपनियों को रेवेन्यू का कुछ हिस्सा सरकार को स्पेक्ट्रम फीस जिसे स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज और लाइसेंस फीस के रूप में जमा करना होता है। टेलिकॉम कंपनियों का डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्युनिकेशन्स से लाइसेंस अग्रीमेंट होता है। अग्रीमेंट में ही एजीआर से जुड़े कंडीशन्स होते हैं।
लाखों करोड़ रुपए का कर्ज
वोडाफोन ग्रुप पहले ही कह चुका है कि वह ज्वाइंट वेंचर वोडाफोन-आइडिया में अब और पूंजी नहीं लगाएगा। 31 दिसंबर तक वोडाफोन-आइडिया का कर्ज 1,15,850 करोड़ रुपए था। इसमें लीज से जुड़ी देनदारियां शामिल नहीं हैं। वहीं एयरटेल पर 35,586 करोड़ रुपए का बकाया है।
लाखों नौकरियां जाने का जोखिम
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक वोडाफोन-आइडिया पर अनिश्चितता की वजह से 11,700 प्रत्यक्ष और 1 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार भी खतरे में आ गए हैं। रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) के चेयरमैन अनिल अंबानी ने कहा था कि टेलीकॉम सेक्टर में 20 लाख रोजगार खत्म हो चुके हैं। आरकॉम ने पिछले साल दिवालिया प्रक्रिया में जाने फैसला लिया था।
मर्जर के डेढ़ साल बाद भी नहीं उबर पाई कंपनी
मई 2014 में जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी तब देश में 13 टेलीकॉम कंपनियां थीं, लेकिन ज्यादातर कंपनियां लागत और कॉम्पीटीशन बढ़ने की वजह से टिक नहीं पाईं। रिलायंस जियो के आने के बाद टेलीकॉम सेक्टर में कॉम्पीटीशन तेजी से बढ़ा है। जियो के फ्री डेटा और सस्ती कॉलिंग रेट्स की वजह से बाकी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गईं। आरकॉम को कारोबार बंद करना पड़ा। वोडाफोन और आइडिया को मर्जर का फैसला लेना पड़ा, लेकिन मर्जर पूरा होने के डेढ़ साल बाद भी कंपनी मुश्किलों से नहीं उबर पाई है।
(प्रतीकात्मक फोटो)
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