
बिजनेस डेस्क। लद्दाख में गलवान वैली में झड़प के दौरान भारतीय जवानों की शहादत के बाद चीनी कंपनियों के बहिष्कार की मुहिम तेज पकड़ रही है। न सिर्फ जन साधारण बल्कि कई सेलिब्रिटीज भी चीनी उत्पादों के पूर्ण बहिष्कार की अपील कर रहे हैं। हालांकि प्रैक्टिकली संभव कैसे होगा यह बड़ा सवाल है।
चीन का भारत में मोटा सालाना निवेश है। खासकर स्मार्टफोन, गैजेट और इलेक्ट्रानिक्स मार्केट में चीनी कंपनियों की बादशाहत है। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि भारत के कुल स्मार्टफोन मार्केट में अकेले चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से ज्यादा है। इसी तरह टीवी-इलेक्ट्रानिक के मार्केट में भी चीन की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से ज्यादा है।
भारत के इन बड़े स्टार्टअप में चीन का पैसा
इतना ही नहीं कई भारतीय कंपनियों में भी चीन का पैसा लगा हुआ है। भारत के 30 में से 18 यूनिकॉर्न में चीनी कंपनियों ने निवेश किया है और ये देश की दिग्गज यूनिकॉर्न हैं। इनमें चीन का कुल निवेश करीब 7600 करोड़ रुपये के बराबर है। स्टार्टअप में 2014 से 2019 के बीच में चीन से करीब 5.5 बिलियन डॉलर निवेश आया है। ओला, बायजूस, फ्लिपकार्ट, पेटीएम, स्वीगी, सिटियस टेक जैसे दिग्गज भारत स्टार्टअप में चीन का बहुत बड़ा निवेश है।
नुकसान किसका, सही तरीका क्या होगा?
अब सवाल ये है कि मौजूदा तनाव के बीच चीनी कंपनियों के बहिष्कार का क्या असर होगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक निश्चित ही असर दोतरफा होगा। यही वजह है कि भारतीय जनमानस का आक्रोश देखकर चीन, चीजों को बातचीत के जरिए हल करने की बात कर रहा है।
एक्सपर्ट्स की राय है कि चीनी बहिष्कार का भारत पर ज्यादा असर होगा। भारत के लिए बेहतर स्थिति तब होगी जब वो चीन के अनुपात में स्मार्टफोन, इलेक्ट्रानिक और गैजेट में प्रतिस्पर्धी निवेश लेकर आए। या इन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी निर्माण को बढ़ावा दे। भारत के लिए जापान, ताइवान और साउथ कोरिया निवेश के लिए चीन के मुक़ाबले बेहतर सहयोगी हो सकते हैं।
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