
Blinkit vs Supermarket: एक कपल ने जब ब्लिंकिट और पास के सुपरमार्केट से खरीदे गए किराने के सामान के खर्च की तुलना की, तो उनका ये अनुभव सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस पोस्ट ने एक बार फिर से ये बहस छेड़ दी है कि क्या घर बैठे सामान मंगाने की सुविधा के लिए हमें ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं?
इस कपल ने एक महीने में ब्लिंकिट पर करीब 20,000 रुपये खर्च किए थे। जब उन्होंने अपने खर्चों का हिसाब लगाया तो पाया कि घर के बजट का एक बड़ा हिस्सा क्विक-डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर जा रहा है। इसके बाद उन्होंने ये जानने के लिए एक एक्सपेरिमेंट करने का फैसला किया। कपल ने ये समझना चाहा कि क्या वे वाकई सुविधा के लिए ज़्यादा पैसे दे रहे हैं। इसलिए, उन्होंने ब्लिंकिट पर खरीदे गए हर सामान की कीमत की तुलना पास के सुपरमार्केट के दामों से की।
जब उन्होंने अपने नतीजे ऑनलाइन शेयर किए, तो पता चला कि दोनों तरीकों से की गई खरीदारी के कुल खर्च में बहुत मामूली अंतर था। ये उनकी उम्मीद से काफी कम था। उन्होंने बताया कि कुछ सामान ब्लिंकिट पर महंगे थे, तो कुछ के दाम सुपरमार्केट जितने ही थे। वहीं, कुछ चीज़ें तो ऑफर्स और प्रमोशन की वजह से सस्ती भी मिलीं। इस तुलना ने उस आम धारणा को चुनौती दी कि क्विक-कॉमर्स से शॉपिंग करना हमेशा महंगा ही पड़ता है।
यहां देखें वायरल वीडियो
वायरल पोस्ट के मुताबिक, उनके फैसले में सुविधा ने एक बड़ी भूमिका निभाई। कपल ने बताया कि इंस्टेंट डिलीवरी सर्विस से समय बचता है, आने-जाने का खर्च कम होता है और बार-बार सुपरमार्केट जाने की झंझट खत्म हो जाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अगर लोग सावधान न रहें तो बिना सोचे-समझे की गई खरीदारी और छोटे-छोटे ऑर्डर से महीने का खर्च बढ़ सकता है।
इस पोस्ट पर हजारों लोगों ने अपनी राय दी और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ अपने अनुभव शेयर किए। कुछ लोगों ने माना कि खासकर व्यस्त नौकरीपेशा लोगों और शहरी परिवारों के लिए, थोड़े-बहुत ज़्यादा पैसे देकर मिलने वाली सुविधा जायज है। वहीं, दूसरों का तर्क था कि महीने भर की या थोक में खरीदारी के लिए पारंपरिक सुपरमार्केट आज भी ज़्यादा किफायती हैं।
कई लोगों ने कमेंट्स में यह भी बताया कि खरीदारी के खर्च की तुलना करते समय पेट्रोल का खर्च, ट्रांसपोर्ट, पार्किंग फीस और अपने समय की कीमत जैसे फैक्टर्स को भी ध्यान में रखना चाहिए। यह चर्चा जल्द ही भारतीय शहरों में बदलते उपभोक्ता व्यवहार और इंस्टेंट-डिलीवरी सेवाओं की बढ़ती लोकप्रियता पर एक बड़ी बातचीत में बदल गई।
यह वायरल तुलना दिखाती है कि कैसे क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म रोजमर्रा की खरीदारी की आदतों को बदल रहे हैं। जहां सुपरमार्केट अभी भी थोक खरीदारी और कीमत को लेकर सजग रहने वाले ग्राहकों के लिए फायदेमंद हैं, वहीं कई खरीदार ब्लिंकिट जैसी सेवाओं की तेजी और सुविधा के लिए थोड़ी ज़्यादा कीमत चुकाने को तैयार दिखते हैं।
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