
बिजनेस डेस्क : 19 सितंबर से गणेश उत्सव (Ganeshotsav) शुरू हो जाएगा। इसकी तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। ऐसे में लालबाग के राजा का पंडाल भी सज रहा है। एक विरासत के तौर पर 90 साल से लाल बाग के राजा (Lal Bagh Ka Raja) का दरबार परंपरा, उसी आस्था के साथ सजता चला आ रहा है। समय के साथ बाहरी सजावट और बजट भले ही बदल गया हो लेकिन आस्था आज भी वैसी की वैसी ही है। लालबाग का दरबार सजाने वाले सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की नींव 1934 में रखी गई थी. आइए जानते हैं समय के साथ लाल बाग के राजा का उत्सव कैसे बदलता गया, इस पर महंगाई ने किस तरह छाप छोड़ा और इस बार क्या-क्या तैयारिया हैं...
छोटे मजदूर और दुकानदार ने शुरू की परंपरा
मुंबई के दादर और परेल से सटा लालबाग इलाके में कई मीलें हुआ करती थीं। इस इलाके में मिल में काम करने वाले मजदूर, छोटे-मोटे दुकानदार और मछुआरे रहा करते थे. साल 1932 में यहां का पेरू चॉल बंद हो गया। इसकी वजह से दुकानदारों और मछुआरों की कमाई का जरिया ही बंद हो गया। खुले में सामान बेचने को मजबूर इन लोगों ने अपनी मन्नत पूरी करने के लिए गणपति की पूजा शुरू की। धीरे-धीरे इस पूजा में लोग जुटने लगे और लालबाग में बाजार खड़ा करने चंदा भी देने लगे। दो साल के अंदर ही दुकानदारों और मछुआरों की मन्नत पूरी होगई और बाजार बनाने के लिए उन्हें जमीन मिल गई। तब उन सभी ने गणेश जी के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए 12 सितंबर 1934 को यहां गणपति प्रतिमा की स्थापना की।
लाल बाग के राजा को इस तरह मिली पहचान
समय के साथ लाल बाग के गणपति की महिमा दूर-दूर तक फैलने लगी। मुंबई के अलग-अलग जगहों से श्रद्धालु यहां आने लगे। तब लालबाग के गणपति को मराठी नाम मिला 'लालबाग चा राजा' मतलब 'लालबाग के राजा'. हर साल गणेशोत्सव में मुंबई में हजारों चमकते-दमकते पांडाल सजाए जाते हैं लेकिन उनमें एक ही नाम सबसे बड़ा माना जाता है 'लालबाग के राजा'...
लाल बाग के राजा के उत्सव पर पैसों की बरसात
साल 1991 के बाद जब देश में इकोनॉमी की नई क्रांति हुई तो इसका असर मुंबई के गणेशोत्सव पर भी पड़ा। गणेश मंडलों की भव्यता और पांडालों की चमक बढ़ाने के लिए स्पॉन्सर लाइन लगाकर खड़े होने लगे। पीआर, विज्ञापन और मीडिया का सबसे ज्यादा प्रयोग समझने में 'लालबाग चा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल' सबसे आगे खड़ा रहा. यहां हर साल करोड़ों में चढ़ावा चढ़ता है। लालबागचा राजा मंडल के अनुसार, पिछले साल यानी 2022 में हर साल के हिसाब से थोड़ा कम चढ़ावा आया था। मंदिर में कुछ दिन में ही तीन किलो सोना, 40 किलो चांदी और 3.35 करोड़ कैश यानी कुल 5.1 करोड़ रुपए का चढ़ावा चढ़ा। हालांकि, यह 6-7 करोड़ रुपए के एवरेज कलेक्शन से कम था। यहां आंकड़ा 5 दिनों का था।
लाल बाग के राजा को सबसे ज्यादा चढ़ावा कब चढ़ा
लालबाग चा राजा मंडल ने बताया कि साल 2018 में 8 करोड़ रुपए का चढ़ावा चढ़ा था। इसमें 5.5 किलो सोना और 75 किलो चांदी भी था। हालांकि, लाल बाग के राजा को सबसे चढ़ावा साल 2008 में चढ़ा था। तब मंडल को 11.5 करोड़ रुपए मिले थे। हर साल यह चढ़ावा बढ़ता जाता है। गणेश उत्सव में लाल बाग के राजा के दर्शन के लिए हर दिन लाखों श्रद्धालु आते हैं।
लाल बाग के राजा के उत्सव का मैनेजमेंट कैसे होता है
10 दिन का उत्सव, लाखों की भीड़ और VIP, VVIP के बीच लालबाग चा राजा मंडल का मैनेजमेंट गजब का है। यहां के स्थानीय युवा कार्यकर्ताओं की टोली काम में जुटी रहती है। गणेशोत्सव की जब शुरुआत होती है तो महीनेभर पहले ही हर किसी की ड्यूटी तय कर दी जाती है। सभी को उसका काम सौंप दिया जाता है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के साथ मीटिंग की जाती है। क्राउड मैनेजमेंट का प्लान बनाया जाता है। हर काम पूरे अनुशासन में होता है। श्रद्धालुओं को किसी तरह की असुविधा न हो, इसके लिए हर साल कुछ न कुछ बदलाव भी होता है।
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