29 लाख रुपए सलाना की जॉब छोड़कर शुरू की तैयारी, नतीजा- 2020 में UPSC टॉपर बने उत्कर्ष कुमार

Asianetnews Hindi संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) में सिलेक्ट हुए 100 कैंडिडेट्स की सक्सेज जर्नी (Success Journey) पर एक सीरीज चला रहा है। इसी कड़ी में हमने उत्कर्ष कुमार से बातचीत की।

Asianet News Hindi | Published : Dec 22, 2021 11:39 AM IST

करियर डेस्क.  झारखंड के रहने वाले उत्कर्ष कुमार (Utkarsh Kumar) ने आईआईटी बॉम्बे से ग्रेजुएशन के बाद एक मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी शुरू की। जॉब के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें अपना समय समाज के लिए कुछ बेहतर करने में लगाना चाहिए तो उन्होंने 29 लाख सालाना पैकेज की नौकरी छोड़ दी और वह सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी में जुट गए। पहले अटेम्प्ट में वह इंटरव्यू तक पहुंचे पर सफलता नहीं मिली। उस समय उन्हें लग रहा था कि अच्छी खासी नौकरी छोड़कर उन्होंने कहीं गलती तो नहीं कर दी। पर उससे आगे बढ़कर उत्कर्ष ने दूसरे अटेम्प्ट की तैयारी में जुटे। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) में उनकी 55 वीं रैंक आई है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) के नतीजे 24 सितंबर, 2021 को जारी किए गए। फाइनल रिजल्ट (Final Result) में कुल 761 कैंडिडेट्स को चुना गया। Asianetnews Hindi संघ लोक सेवा आयोग (UPSC 2020) में सिलेक्ट हुए 100 कैंडिडेट्स की सक्सेज जर्नी (Success Journey) पर एक सीरीज चला रहा है। इसी कड़ी में हमने उत्कर्ष कुमार से बातचीत की। आइए जानते हैं उनकी सक्सेज जर्नी। 

आंखें खोलने वाली रही तीन साल की यूपीएससी जर्नी
उत्कर्ष कहते हैं कि उनकी तीन साल की यूपीएससी जर्नी बहुत मामलों में आंखें खोलने वाली रही। जब आप पढ़ते हो तो बहुत चीजें समझते हो एक अप्रोच आ जाता है। जबकि पहले कुछ भी होता है तो सरकार को ब्लेम करना आसान लगता है। सोचने का नजरिया बड़ा होता है। आप सोचते हैं कि कोई चीज में समस्या है तो क्यों आ रही है, इसका क्या सॉल्यूशन होना चाहिए? आपको आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सेटअप की एक बेहतर समझ मिलती है। पहले दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट यानि सही या गलत में दिखाई देती है। पढ़ाई करके अनुभव होता है कि अलग-अलग दृष्टिकोण और अलग-अलग नैरेटिव साथ में चल सकते हैं और उनमें से कोई सही या गलत नहीं होता है। अनुशासन और हार्डवर्क की आदत विकसित होती है। जब एस्पिरेंट्स कमा नहीं होते हैं तो अनावश्यक खर्चे हट जाते हैं। इससे एक सिम्पल लाइफ जीने की आदत पड़ जाती है।

कॉलेज में हुआ पर्सनालिटी का विकास
उत्कर्ष कहते हैं कि वह मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके दोनों पेरेंट्स गवर्नमेंट जॉब में हैं। पर 6 वीं पे कमीशन से पहले सैलरी बहुत ज्यादा नहीं थी। घर पर कोई खर्च वगैरह होता था तो दो बार सोचकर करना पड़ता था। पर पैरेंटस का पढ़ाई पर हमेशा फोकस रहा। छोटे टाउन में था तो उतने अवसर नहीं थे। स्कूल में इनट्रांवर्ड किड था। अच्छे कॉलेज   गया तो आगे की दुनिया खुल गई। वहीं पर पर्सनालिटी का विकास हुआ। फाइनेंसियली इंडिपेंडेट भी हुआ क्योंकि अच्छी जॉब लग लगी थी। लेकिन स्कूल का फेज थोड़ा मुश्किल था उतनी दुनिया देखी नहीं थी। बाकी लोगों की स्टोरी सुनता हूं तो जो बेसिक बुनियादी चीजें थी, वह मेरे पास ठीक थी। उत्कर्ष की प्रारम्भिक शिक्षा डीएवी स्कूल हजारीबाग से हुई। उन्होंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कोटा से की और आईआईटी बॉम्बे से कम्प्यूटर साइंस से बीटेक किया। उसके बाद एक साल बेंगलुरू में एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी की।

यूपीएससी का सक्सेस रेट 0.05 प्रतिशत
उत्कर्ष कहते हैं कि बहुत प्रतिस्पर्धा है। यूपीएससी का सक्सेस रेट 0.05 प्रतिशत है। सम्भव ही नहीं है कि सब लोग सफल हों। वास्तव में बहुत ही छोटा सा कंपोनेंट सफल होता है। सफल होने में प्राय: काफी अटेम्प्ट लगते हैं। बहुत सारे पेपर होते हैं, कुछ चीजें आपको पसंद नहीं होते हैं। पहले अटेम्प्ट में सफलता मिली तो मेरे लिए यह लाइफ का पहला फेलियर था। पहले भी सेटबैक आए थे। लेकिन जो चाहता था वह नहीं मिला लेकिन कुछ उससे नीचे की चीज मिल जाती थी, तो वह स्वीकार करना मुश्किल था कि मुझसे नहीं हुआ।

नौकरी छोड़कर तैयारी का आसान नहीं था फैसला
वह कहते हैं कि कभी कभी यह भी लगता था कि इस बार नहीं हुआ तो क्या होगा। एक जॉब छोड़कर आया था तो एक प्रेशर था, उसे जस्टिफाई करना था कि मैं यहां पर सिर्फ टाइमपास नहीं कर रहा हूं। यूपीएससी परीक्षा की तैयारी में बहुत सोच समझकर आया था। एक ऑफिसर से बात की थी। कुछ किताबें पढ़ीं थीं और विजन बिल्कुल स्पष्ट था। यह चीजें मेरे लिए मोटिवेशन बन गयी थी। स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए हॉबीज को एक्टिव परशु करता था। चाहे वह बोर्ड गेम्स खेलना हो या किताबें पढ़ना। हफ्ते में तीन से चार बार दौड़ने जाता था। मेरे लिए वह भी स्ट्रेस बस्टर था, खुद को एक्टिव रखता था। टीचर्स और फैमिली का विश्वास और सपोर्ट रहा। जब डिमोटिवेट होता था तो सबसे बात करता था। यह सब चीजें मिलाकर अच्छा हो पाया।

अकेले गुम होना आसान
तैयारी के समय उनका तीन एस्पिरेंट्स का ग्रुप था। वह लोग आपस में डिस्कशन करते थे। प्रीलिम्स के लिए एक दूसरे से सवाल पूछते थे। मेंस के आंसर शीट एक्सचेंज करते थे। बाद में एक दूसरे का इंटरव्यू भी लेते थे। उत्कर्ष कहते हैं कि उससे थोड़ा मोटिवेट होना आसान रहता है। वरना अकेले गुम होना आसान है। सामान्य: वह प्रतिदिन 9 से 10 घंटे पढते थे।

परिवार, टीचर और दोस्तों का अहम योगदान
पिता महेश कुमार और मां सुषमा बरनवाल को सफलता का श्रेय देते हुए उत्कर्ष कहते हैं कि पूरे परिवार का सपोर्ट रहा। उनके मौसा डॉक्टर रमन कुमार, मौसी कविता बरनवाल, बहन आस्था रमन, जीजा किशोर कौशल आईपीएस अफसर हैं। पूरे परिवार को उन पर भरोसा था कि वह अच्छा करेंगे। टीचर सात्विक भान हमेशा उपलब्ध रहते थे। दोस्त हर्षल महाजन और प्रियंका का भी अहम योगदान है। हम लोग एक ग्रुप बनाकर साथ में डिस्कशन करते थे। एक दूसरे को प्रोत्साहित करते थे। उनके पिता जूनियर इंजीनियर हैं और मां टीचर हैं। छोटा भाई आयुष कुमार गया से एमबीबीएस कर रहा है।  

वर्षों में कैसे इंसान बने यह चीज इंटरव्यू में होती है टेस्ट
उत्कर्ष कहते हैं कि यूपीएससी परीक्षा के तीनों चरणों में इंटरव्यू सबसे ज्यादा इंटरेस्टिंग भी है। आपको एसेंशियली बात करनी है। खुद की और आस पास के मुद्दों की कहानी सुननी है। ये पूरा आपके स्किल पर है कि आप कितने अच्छे से बातचीत कर पाते हो। उनका मानना है कि एस्पिरेंट्स इंटरव्यू की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर देते हैं। जैसे जब वह कॉलेज में हैं तो क्या हॉबीज हैं, टीम वर्क या लीडरशिप की किसी एक्टिविटी या किसी प्रतिस्पर्धा में शामिल हो रहे हैं। यह सब चीजें आपकी प्रोफाइल का हिस्सा बनती हैं। आप वर्षों में जैसे इंसान बने हो, आपकी यह चीज इंटरव्यू में टेस्ट होती है। इसे आप छह महीने या साल भर में बदल नहीं सकते। उसके पहले आप अपनी ताकत और कमजोरी के साथ, क्या किया है और क्या नहीं किया है, सिर्फ इसे रिफाइन करते हो। ताकि आप उसको प्रेजेंट कर सको।

सिर्फ बोर्ड की बातों से ही न हों कन्वेंस
उत्कर्ष कहते हैं कि इंटरव्यू में आप बोर्ड की बातों से ही कन्वेंशन न हो जाओ जो बोलो सोच समझकर बोलो। उसके पहले अटेम्प्ट के इंटरव्यू में उनसे ऐसा ही एक सवाल किया गया था कि प्राइवेट सेक्टर के लोगों की सैलरी में कैप कर देना चाहिए। एक बेंचमार्क से ऊपर की सैलरी नहीं मिलनी चाहिए। यस बैंक का उदाहरण देते हुए कहा गया था कि वह लोग सैलरी भी लेते हैं और स्कैम भी करते हैं। उनका कहना है कि ऐसे सवालों पर आपको जो आता है, उसे सलीके से पेश करें। यह तभी संभव है, जब आप कहीं ब्लफ नहीं कर रहे हों।
 
ये तीन चीजें बनाती हैं बेहतर माइंडसेट
उत्कर्ष कहते हैं कि एस्पिरेंट्स अपना मोटिवेशन समझे कि वह अपनी एनर्जी यहां क्यों लगा रहे हैं। दूसरी, अपनी गलतियां स्वीकारें। अक्सर लोग अपनी कमजोरी देखने के बाद उसको किनारे कर देते हैं कि उतना प्राब्लम नहीं है, हो जाएगा। पर जब तक आप उसे स्वीकार नहीं करते हैं, आप आगे नहीं बढ़ सकते। तीसरी चीज है कॉन्शियसली पढाई और टेस्ट। जब आप पढ़ाई कर रहे हैं, तब आप कॉन्शियसली देख रहे हो कि आप क्या सीख रहे हो। आप सिर्फ किताब खोल कर नहीं बैठो हो। कॉन्शियसली खुद को टेस्ट कर रहे हो। चीटिंग वगैरह नहीं कर रहे हो। टेस्ट के परफार्मेंस के हिसाब से खुद को इम्प्रूव कर रहे हो। माइंडसेट ठीक रहता है, तो चीजें आगे हो जाती हैं।

नाम के लिए मत दें अटेम्प्ट
उत्कर्ष कहते हैं कि अगर आपको अपनी तैयारी में इम्प्रूवमेंट दिख रहा है कि आप कैसे सफल हो सकते हो तो तैयारी में बने रहने का सेंस बनता है। अपने पहले अटेम्प्ट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि मेरा ऑप्शनल काफी अच्छा था। इंटरव्यू भी काफी अच्छा था। सिर्फ मुझे जीएस पर काम करना है। मैंने कॉन्शियसली उस पर काम किया। तीसरे अटेम्प्ट की अगर बात होती तो मैं वह भी लेता। जीएस में इम्प्रूवमेंट के चांसेस थे। जिस दिन मुझे लगता कि अब इम्प्रूवमेंट नहीं दिख रहा है तो सिर्फ नाम के लिए अटेम्प्ट नहीं देता।

एस्पिरेंट्स मेंटल हेल्थ पर भी दें ध्यान
उनका कहना है कि एस्पिरेंट्स को इसलिए तैयारी में नहीं उतरना चाहिए, क्योंकि उनका दोस्त भी तैयारी कर रहा है। उसके लिए आपका खुद का मोटिवेशन होना चाहिए।  बहुत सारे सोर्सेज और किताबों के पीछे मत भागो। सिर्फ पढ़ाई पर ही नहीं बल्कि टेस्ट पर भी ध्यान दें। अक्सर देखा जाता है कि लोग पढ़ लेते हैं पर लिखने की प्रैक्टिस नहीं करते हैं। प्रैक्टिस नहीं होगी तो कम समय में आप लिख नहीं पाओगे। एस्पिरेंट्स अपने मेंटल हेल्थ को लेकर चलें। अपनी हॉबीज को लेकर चलें।

इन वजहों से सिविल सर्विस की तरफ बढ़ाया कदम
उत्कर्ष कहते हैं कि उनके मां-पिता सरकारी जॉब में हैं। उसमें लोगों के प्रति काम करने का नजरिया होता है। पापा चाहते थे कि सरकारी जॉब की तरफ आऊं पर कॉलेज में अवसर मिल गए तो प्राइवेट जॉब की तरफ चला गया। जॉब के दौरान एक डिस्कनेक्ट फील कर रहा था। जॉब में अमेरिकन मार्केट के लिए काम कर रहा था। मेरे क्लाइंट अमेरिकन थे। मन में यह ख्याल आता था कि जब उनके लिए इतना समय लगा रहा हूं तो इंडिया के लिए क्यों न लगाऊं। वरिष्ठ नौकरशाह केजे अल्फोंस की किताब पढ़ी। वह भी काफी मोटिवेशनल लगा, इंटरव्यू वगैरह देखा। कुछ अफसरों व दोस्तों से बात की तो अंततः: यह तय हुआ कि सिविल सर्विस में करने के लिए बहुत कुछ है। 

गतिहीन होना आसान, आसानी से ग्रो करना भूल सकते हैं
उत्कर्ष कहते हैं कि एस्पिरेंट्स खुद को समझे कि उनकी रूचि किसी चीज में है। उनको क्या मोटिवेट करता है। उस आधार पर निर्णय लेना चाहिए कि क्या करना है। उस आधार पर नहीं कि कुछ लोग फेमस हैं या दोस्त कर रहे हैं तो मैं भी यही करूंगा। झटके में निर्णय नहीं होना चाहिए ताकि जब आप निर्णय ले लो और कठिनाइयां आए तो आप यह सोचो कि आप क्या सोचकर यहां आए थे। खुद में ग्रोथ का तरीका ढूंढो। आपको खुद को पुश करना होगा। स्थिर या गतिहीन होना आसान है। आप बहुत आसानी से ग्रो करना भूल सकते हो। उत्कर्ष कहते हैं कि आजकल इंटरनेट का जमाना है। सोसाइटी का गैप तेजी से कम हो रही है। नॉलेज एक फिंगर टिप्स पर उपलब्ध है। इंटरनेट पर ऑनलाइन मटेरियल मिल जाएगा। युवा पीढ़ी इसका फायदा उठाए।

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