
भारतीय सिनेमा में आज हॉरर फिल्मों का बड़ा बाजार है। 'स्त्री', 'भूल भुलैया', '1920' और 'हॉन्टेड 3D' जैसी फिल्मों ने दर्शकों को खूब डराया है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में हॉरर सिनेमा की असली शुरुआत 1949 में रिलीज हुई फिल्म 'महल' से मानी जाती है। कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी यह फिल्म सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं थी, बल्कि रहस्य, पुनर्जन्म, प्रेम और सुपरनेचुरल एक्टिविटीज का ऐसा मिश्रण थी, जिसने भारतीय दर्शकों को पहली बार हॉरर अनुभव से रूबरू कराया। यही वजह है कि दशकों बाद भी 'महल' भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है।
आज से करीब सात दशक पहले रिलीज हुई 'महल' ने उस दौर में एक नया सिनेमाई प्रयोग पेश किया था। फिल्म में रहस्यमयी हवेली, अजीब घटनाएं, रहस्यमय महिला और पुनर्जन्म जैसे तत्व शामिल थे। उस समय दर्शकों ने इस तरह की कहानी पहले कभी बड़े पर्दे पर नहीं देखी थी। यही कारण रहा कि फिल्म ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और हॉरर-मिस्ट्री शैली को पॉपुलर बनाया। फिल्म 19 अक्टूबर 1949 को थिएटर्स में रिलीज हुई थी। लेकिन आज भी जब हॉरर फिल्मों की बात होती है तो इसे याद किया जाता है।
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फिल्म में अशोक कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। खासतौर पर मधुबाला का रहस्यमयी किरदार दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गया था। उन्होंने फिल्म में भूत का किरदार निभाया था। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और फिल्म का रहस्यमय माहौल दर्शकों को अंत तक बांधे रखता था। यही फिल्म मधुबाला के करियर के शुरुआती बड़े मील के पत्थरों में भी गिनी जाती है।
फिल्म का गीत 'आएगा आने वाला' भारतीय फिल्म संगीत के सबसे यादगार गीतों में शामिल है। लता मंगेशकर की आवाज में रिकॉर्ड यह गाना फिल्म की पॉपुलैरिटी का बड़ा कारण बना। आज भी यह गीत भारतीय सिनेमा के क्लासिक गानों में गिना जाता है।
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'महल' सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं थी, बल्कि इसने भारतीय फिल्मों में रहस्य और मनोवैज्ञानिक डर को नए अंदाज में पेश किया। इसके सिनेमेटोग्राफी, लाइटिंग और शैडो इफेक्ट्स को उस दौर से काफी आगे माना गया। ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट ने इसे 10 सबसे बेहतरीन रोमांटिक हॉरर फिल्मों की कैटेगरी में रखा है। बाद में कई हॉरर और मिस्ट्री फिल्मों पर इसका प्रभाव देखने को मिला। रिलीज के 75 साल से ज्यादा समय बाद भी 'महल' को भारतीय हॉरर सिनेमा की बुनियाद माना जाता है। फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि अगर 'महल' जैसी फिल्में नहीं बनतीं तो भारतीय सिनेमा में हॉरर जॉनर को इतनी जल्दी पहचान नहीं मिलती। आज भी नई पीढ़ी इस फिल्म को भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे प्रभावशाली क्लासिक फिल्मों में गिनती है।
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