
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया स्टारर ‘द वन – फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। ‘पंचायत’ फेम दीपक कुमार मिश्रा के निर्देशन में बनी फिल्म माइथोलॉजी, लोककथा और सुपरहीरो फैंटेसी को एक साथ पेश करने की कोशिश करती है। कहानी मुंबई से शुरू होकर देवांचल और फिर एक रहस्यमयी जंगल तक पहुंचती है, लेकिन फिल्म लगातार अपना ट्रैक बदलती रहती है। सिद्धार्थ के साथ सुनील ग्रोवर, अनूप सोनी, श्वेता तिवारी और मनीष पॉल जैसे कलाकार भी नजर आते हैं। फिल्म का आइडिया दिलचस्प है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, जबरन हास्य और बिखरे नैरेटिव के चलते यह दर्शक को लगातार बांधे रखने में संघर्ष करती है।
फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाले इंजीनियर ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है, जिसकी शादी ममता (तमन्ना भाटिया) से हुई है। छह साल पहले देवांचल में हुई एक घटना के बाद ममता मां नहीं बन पातीं। ऋषि का बड़ा भाई बार-बार उसे गांव लौटने के लिए कहता है। छठ पूजा के दौरान ऋषि जमीन से जुड़े मामले के बहाने देवांचल पहुंचता है। वहां उसे देव वन के बारे में पता चलता है, जिसे देवी का पवित्र निवास माना जाता है और जहां सूर्यास्त के बाद जाना मना है। एक बैल के जंगल में चले जाने पर ऋषि उसे वापस लाने पहुंचता है और फिर कहानी अलौकिक घटनाओं की तरफ मुड़ जाती है।
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सिद्धार्थ मल्होत्रा का प्रदर्शन औसत नजर आता है और ऋषि के किरदार में वह पूरी तरह फिट नहीं बैठते। तमन्ना भाटिया के पास करने के लिए सीमित जगह है। सुनील ग्रोवर विलेन की भूमिका में ईमानदार कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी कॉमिक इमेज गंभीर दृश्यों पर असर डालती है। मनीष पॉल और सुलभा आर्या फिल्म में हास्य का हिस्सा संभालते हैं, लेकिन कई कॉमिक सीन कहानी का स्वाभाविक हिस्सा लगने के बजाय फिलर जैसे महसूस होते हैं।
‘पंचायत’ जैसी चर्चित सीरीज के लिए पहचाने जाने वाले दीपक कुमार मिश्रा इस बार बड़े पर्दे पर फैंटेसी और सुपरहीरो जॉनर आजमाते हैं। समस्या यह है कि फिल्म कई विचारों को एक साथ जोड़ती है, लेकिन उन्हें एक मजबूत दिशा नहीं दे पाती। जंगल में रहस्य और डर पैदा करने की पर्याप्त गुंजाइश थी, लेकिन निर्देशन उस माहौल को प्रभावी ढंग से नहीं बना पाता। छठ को कहानी से जोड़ने की कोशिश भी स्वाभाविक नहीं लगती और क्लाइमैक्स में हवाई एक्शन फिल्म को काफी अलग दिशा में ले जाता है।
फिल्म के म्यूजिक को कहानी का मजबूत सहारा बनाने का मौका था, लेकिन यह फिल्म की सबसे बड़ी ताकत नहीं बन पाता। वहीं टेक्निकल स्तर पर जंगल और फैंटेसी वर्ल्ड फिल्म के लिए महत्वपूर्ण थे, लेकिन उनका इस्तेमाल उतने प्रभावी ढंग से नहीं हुआ, जितनी उम्मीद थी। सबसे बड़ी तकनीकी समस्या स्क्रीनप्ले है। कहानी मुंबई से देवांचल और फिर जंगल तक जाती है, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म एक दिशा तय करने के बजाय नए-नए आइडिया जोड़ती जा रही है।
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अगर आपको माइथोलॉजी, लोककथा, सुपरहीरो फैंटेसी और सुपरनेचुरल कहानियां पसंद हैं, तो फिल्म का मूल आइडिया आपको आकर्षित कर सकता है। लेकिन मजबूत कहानी, लगातार रोमांच और गंभीर फैंटेसी ट्रीटमेंट की उम्मीद लेकर जाने वाले दर्शकों को निराशा हो सकती है। दिलचस्प आइडिया होने के बावजूद ‘द वन’ उसे एक सहज और असरदार सिनेमाई अनुभव में बदल नहीं पाती। हमारी ओर से फिल्म को 5 में से 2 स्टार।
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