The Paradise Film Review: ‘द पैराडाइज’ का पहला हाफ माहौल, नानी की दमदार एक्टिंग और जबरदस्त बिल्डअप से बांधता है, लेकिन इंटरवल के बाद कहानी हिंसा के बोझ तले अपनी पकड़ खोने लगती है।

1980 के दशक का सिकंदराबाद, हाशिए पर खड़ा सावरी समुदाय और उसके बीच जेल से लौटता जदल... ‘द पैराडाइज’ की शुरुआत एक ऐसी दुनिया रचती है, जहां ताकत दिखाई कम देती है, महसूस ज्यादा होती है। श्रीकांत ओडेला फिल्म के माहौल, किरदारों और सत्ता के समीकरणों को धीरे-धीरे सामने लाते हैं। नानी यहां अपने चिर-परिचित अंदाज से बिल्कुल अलग अवतार में नजर आते हैं और जदल के भीतर पनप रहे गुस्से को बिना शोर के पर्दे पर उतारते हैं। इंटरवल तक फिल्म का तनाव लगातार बढ़ता है और कहानी एक बड़े टकराव की उम्मीद जगाती है। लेकिन क्या दूसरा हाफ उस उम्मीद पर खरा उतरता है? यहीं फिल्म थोड़ा लड़खड़ाती है।

क्या है ‘द पैराडाइज’ की कहानी?

कहानी 1980 के दशक के सिकंदराबाद में बसे सावरी समुदाय की है, जो पहचान, सम्मान और अपने अधिकारों के लिए जूझ रहा है। जेल से लौटने वाला जदल खुद को बदली हुई दुनिया में पाता है, जहां मलिक का दबदबा पूरे समुदाय पर है। शुरुआत में जदल अपने आसपास के माहौल और पुराने रिश्तों को समझने की कोशिश करता है, लेकिन धीरे-धीरे वह उस व्यवस्था के खिलाफ उठ रहे विद्रोह का हिस्सा बन जाता है। फिल्म का पहला हाफ इसी दुनिया और जदल के बदलाव को काफी धैर्य के साथ स्थापित करता है। रिश्ते, पुरानी दुश्मनी और सत्ता का डर कहानी में तनाव पैदा करते हैं। इंटरवल तक पहुंचते-पहुंचते जदल का गुस्सा एक बड़े टकराव की जमीन तैयार कर देता है। समस्या दूसरे हाफ में शुरू होती है, जहां कहानी आगे बढ़ाने के बजाय लगातार हिंसक भिड़ंत पर ज्यादा निर्भर हो जाती है।

‘द पैराडाइज’ की स्टार कास्ट की परफॉर्मेंस

नानी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। जदल का किरदार उनके अब तक के आम स्क्रीन इमेज से काफी अलग है। उनकी चाल-ढाल, हावभाव और चेहरे की गंभीरता किरदार के भीतर छिपे गुस्से को उभारती है। खास बात यह है कि नानी शुरुआत से जदल को किसी सुपरहीरो की तरह पेश नहीं करते। उसका आक्रामक रूप धीरे-धीरे सामने आता है और इसलिए उसके हिंसक विस्फोट ज्यादा असरदार लगते हैं।

कयादू लोहार सुब्बू के किरदार में गर्मजोशी लाती हैं और नानी के साथ उनके हिस्से फिल्म को जरूरी मानवीय स्पर्श देते हैं। सोनाली कुलकर्णी मां-बेटे के रिश्ते में भावनात्मक वजन जोड़ती हैं। मोहन बाबू मलिक की भूमिका में प्रभावशाली हैं, जबकि राघव जुयाल अपने किरदार में खतरा और अनिश्चितता लेकर आते हैं। संपूर्णेश बाबू सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद अपनी छाप छोड़ते हैं।

श्रीकांत ओडेला का डायरेक्शन कैसा है?

श्रीकांत ओडेला की सबसे बड़ी उपलब्धि फिल्म की दुनिया को विश्वसनीय बनाना है। वह सावरी समुदाय को सिर्फ कहानी की पृष्ठभूमि नहीं बनाते, बल्कि उसकी अपनी संस्कृति, व्यवस्था और इतिहास महसूस कराते हैं। पहला हाफ इसी वजह से ज्यादा असरदार बनता है। एक्शन को भी शुरुआत में कहानी से जोड़ा गया है। हिंसा कच्ची, भारी और असहज महसूस होती है, न कि सिर्फ स्टाइलिश एक्शन सीक्वेंस जैसी। लेकिन इंटरवल के बाद निर्देशन की यही ताकत कमजोरी में बदल जाती है। लगातार बढ़ते एक्शन और टकराव कहानी के भावनात्मक हिस्से को पीछे धकेल देते हैं। जदल और मलिक के बीच जिस बड़े टकराव की तैयारी की जाती है, उसका भावनात्मक भुगतान उतना मजबूत नहीं बन पाता।

कैसा है ‘द पैराडाइज’ का म्यूजिक?

अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म के मूड को कई जगह मजबूती देता है। ‘आया शेर’ एनर्जी और स्वैग लेकर आता है, जबकि ‘येशनागुला’ दूसरे हाफ के चुनिंदा प्रभावशाली हिस्सों में शामिल है। बैकग्राउंड स्कोर हालांकि हर जगह समान प्रभाव नहीं छोड़ता। कुछ दृश्यों में यह तनाव बढ़ाता है, लेकिन कुछ जगह सीन से ज्यादा तीव्रता थोपता हुआ महसूस होता है।

क्यों देखें/क्यों न देखें ‘द पैराडाइज’?

अगर आपको माहौल से कहानी कहने वाली फिल्में, अलग तरह के किरदार और रॉ एक्शन पसंद हैं तो ‘द पैराडाइज’ का पहला हाफ काफी कुछ देता है। नानी का ट्रांसफॉर्मेशन, सावरी समुदाय की दुनिया और श्रीकांत ओडेला की विजुअल स्टाइल फिल्म को देखने की वजह बनती है। लेकिन दूसरा हाफ निराश कर सकता है। कहानी धीरे-धीरे एक्शन और बदले के दोहराव में फंस जाती है और कई किरदारों को पर्याप्त स्पेस नहीं मिल पाता। हमारी ओर से फिल्म को 5 में से 2.5 स्टार।