
प्रसिद्ध अभिनेता और UNICEF India के राष्ट्रीय एम्बेसडर आयुष्मान खुराना ने महाराष्ट्र के जालना जिले का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने सीज़नल माइग्रेशन से प्रभावित बच्चों, उनके परिवारों और स्थानीय समुदायों से मुलाकात की। यह दौरा UNICEF समर्थित उस कार्यक्रम का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य प्रवासी परिवारों के बच्चों को परिवार और समुदाय आधारित देखभाल के जरिए सुरक्षित रखना है। खुराना के साथ UNICEF India की टीम भी मौजूद रही। टीम में UNICEF India के Representative (a.i.) जेस्पर मोलर शामिल थे। इस पहल को महाराष्ट्र सरकार, जिला प्रशासन और NGO साझेदारों का सहयोग मिल रहा है।
कार्यक्रम का मुख्य फोकस उन बच्चों की सुरक्षा पर है, जिनके माता-पिता रोजी-रोटी के लिए हर साल कुछ समय के लिए दूसरे इलाकों में पलायन करते हैं। ऐसे परिवारों में बच्चों को अपने माता-पिता के साथ जाना पड़ सकता है या उन्हें गांव में दादा-दादी और अन्य रिश्तेदारों के पास छोड़ दिया जाता है। दोनों ही परिस्थितियों में बच्चों के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां खड़ी होती हैं।
कई हाशिए पर रहने वाले परिवारों के लिए मजबूरी में किया जाने वाला सीज़नल माइग्रेशन जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इसका सीधा असर बच्चों पर भी पड़ता है। माता-पिता के साथ दूसरे स्थानों पर जाने वाले बच्चों के लिए पढ़ाई छूटने, बाल मजदूरी, बाल विवाह, उपेक्षा और हिंसा का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं, जो बच्चे अपने गांव में रह जाते हैं और दादा-दादी या दूसरे रिश्तेदारों के साथ रहते हैं, उनके लिए स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े रहना आसान हो सकता है। हालांकि, उन्हें भावनात्मक तनाव, उपेक्षा और घर की अतिरिक्त जिम्मेदारियों जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए UNICEF भारत सरकार के साथ मिलकर बाल संरक्षण व्यवस्था को मजबूत करने पर काम करता है। इसका मकसद बच्चों को हिंसा, दुर्व्यवहार, शोषण और उपेक्षा से बचाना है और जरूरत पड़ने पर उन्हें समय रहते सहायता उपलब्ध कराना है।
जालना में जिला प्रशासन और NGO साझेदारों के साथ लागू किया जा रहा Kinship and Community Care कार्यक्रम इसी दिशा में एक अहम मॉडल के तौर पर सामने आया है। इस व्यवस्था में कोशिश की जाती है कि जब माता-पिता सीज़नल काम के लिए बाहर जाएं, तो बच्चों को उनके परिवार या भरोसेमंद समुदाय के लोगों की देखभाल में रखा जाए। इससे बच्चों को अपना घर, परिवार और स्कूल छोड़ने की जरूरत कम पड़ती है।
ग्राम पंचायतों, समुदाय और अग्रिम स्तर पर काम करने वाले सेवा प्रदाताओं को इस व्यवस्था से जोड़ा गया है। इससे बच्चों के लिए एक स्थानीय सुरक्षा तंत्र तैयार होता है। यह तंत्र उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और मनोसामाजिक सहयोग जैसी जरूरी सेवाओं से जोड़े रखने में मदद करता है। कार्यक्रम का एक बड़ा लक्ष्य बाल मजदूरी, बाल विवाह और किशोर गर्भधारण जैसे जोखिमों को कम करना भी है।
बच्चों और समुदाय के लोगों से मुलाकात के बाद आयुष्मान खुराना ने कहा कि मजबूरी में होने वाला सीज़नल माइग्रेशन कोई विकल्प नहीं है। यह कई परिवारों की कठोर वास्तविकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी बच्चे को अपनी परिस्थितियों की वजह से अपना बचपन नहीं खोना चाहिए। जालना में उन्होंने देखा कि किस तरह समुदाय मिलकर माइग्रेशन से प्रभावित बच्चों की सुरक्षा कर रहे हैं और उन्हें परिवार, देखभाल और सहयोग से जोड़े रखने की कोशिश कर रहे हैं। खुराना के मुताबिक, Kinship Care केवल बच्चों को सुरक्षित घर उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। यह बच्चों के पारिवारिक रिश्तों को बनाए रखने, उनका आत्मविश्वास बढ़ाने और उनके सामने बेहतर भविष्य की उम्मीद कायम रखने में भी मदद करता है।
दौरे के दौरान आयुष्मान खुराना ने युवा Community Leaders से भी मुलाकात की। इनमें शंकर आसाराम शामिल थे। उन्होंने Youth Volunteer के तौर पर समुदाय के बीच काम किया और लोगों का भरोसा हासिल किया। बाद में उन्हें गांव के सरपंच के रूप में चुना गया। खुराना ने प्रतिक्षा से भी बातचीत की। वह कक्षा 12 की छात्रा हैं और Balmitra के रूप में बच्चों से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं। उन्होंने देखा है कि सीज़नल माइग्रेशन का किशोरियों और उनकी पढ़ाई पर किस तरह असर पड़ता है।
Balmitra बच्चों और उनके समुदायों के लिए भरोसेमंद स्थानीय मददगार की भूमिका निभाते हैं। वे बच्चों के अधिकारों, सुरक्षा और कल्याण को लेकर जागरूकता बढ़ाने में मदद करते हैं। उनका प्रयास बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने के साथ-साथ बाल मजदूरी और बाल विवाह को रोकने पर भी केंद्रित है।
आयुष्मान खुराना ने बच्चों की सुरक्षा के लिए मौजूद कानूनी व्यवस्था का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत कानून हैं और Juvenile Justice Act भी इसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस कानून को इस साल 10 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इन सुरक्षा उपायों का लाभ हर बच्चे और हर परिवार तक पहुंचे। खासकर उन परिवारों तक, जो सीज़नल माइग्रेशन जैसी परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। उनका कहना था कि बच्चों को केवल कानूनों की जरूरत नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर ऐसी व्यवस्था भी चाहिए जो जोखिम की पहचान कर सके और जरूरत पड़ने पर परिवार को सही सेवाओं से जोड़ सके।
दौरे के दौरान खुराना ने किशोरियों, बच्चों और परिवारों से बातचीत की और यह समझने की कोशिश की कि गांव के स्तर पर कार्यक्रम किस तरह काम कर रहा है। उन्होंने 18 वर्षीय शिल्पा से मुलाकात का जिक्र भी किया। शिल्पा कभी अपने परिवार के साथ सीज़नल माइग्रेशन कर चुकी थीं। अब उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली है और एक व्यावसायिक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया है।
खुराना ने कहा कि उम्मीद है कि शिल्पा की शिक्षा और कौशल उन्हें सीज़नल माइग्रेशन के पीढ़ीगत चक्र को तोड़ने में मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि जब लड़कियों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित माहौल मिलता है तो उनके सपनों को पूरा करने के रास्ते खुलते हैं। उनके मुताबिक, बच्चों का सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में बड़ा होना उनके भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।
आयुष्मान खुराना ने ऐसे परिवार से भी मुलाकात की, जहां दो छोटे पोते-पोतियों की देखभाल उनके दादा-दादी कर रहे हैं। बच्चों के पिता सीज़नल काम के लिए बाहर प्रवास करते हैं। ऐसी स्थिति में परिवार और समुदाय की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। Balmitra और स्थानीय समुदाय के सहयोग से ये बच्चे स्कूल से जुड़े हुए हैं। साथ ही उन्हें पोषण और टीकाकरण जैसी जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं तक भी पहुंच मिल रही है।
इस तरह की Kinship Care व्यवस्था बच्चों को उनके परिचित पारिवारिक वातावरण में बनाए रखने की कोशिश करती है। इसका फायदा यह है कि माता-पिता के काम के लिए बाहर जाने के बावजूद बच्चों की पढ़ाई और जरूरी सेवाएं पूरी तरह बाधित न हों।
खुराना ने अपने दौरे के दौरान कहा कि हर बच्चे को सुरक्षित, प्यार और देखभाल वाले पारिवारिक वातावरण में बड़ा होने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि सरकार बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून और योजनाएं उपलब्ध कराती है। वहीं UNICEF, महाराष्ट्र सरकार, जिला प्रशासन और गांव के समुदाय मिलकर इन व्यवस्थाओं को जमीन पर प्रभावी बनाने के लिए काम कर रहे हैं।
ग्राम पंचायतों और अग्रिम स्तर पर काम करने वाले सेवा प्रदाताओं को साथ लाकर तैयार किया गया यह मॉडल बच्चों के लिए एक तरह का सुरक्षा जाल तैयार करता है। इसके जरिए बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और मनोसामाजिक सहायता से जोड़े रखने की कोशिश की जाती है।
UNICEF India के Representative (कार्यवाहक) जेस्पर मोलर ने कहा कि UNICEF को जालना जिला प्रशासन के साथ काम करने पर गर्व है। इसका उद्देश्य सबसे कमजोर बच्चों के लिए सुरक्षित और पोषण देने वाला वातावरण तैयार करना है। उन्होंने कहा कि बच्चों के खिलाफ हिंसा को रोका जा सकता है। Juvenile Justice Act, 2015 के 10 वर्ष पूरे होने के मौके पर उन्होंने अंतिम स्तर की बाल संरक्षण प्रणालियों को और मजबूत करने की जरूरत बताई।
उनके मुताबिक, स्थानीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिससे बच्चों के सामने मौजूद जोखिमों की जल्द पहचान हो सके और जरूरतमंद परिवारों को उचित सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जा सके। जेस्पर मोलर ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर आवाज उठाने और हर बच्चे के सुरक्षा तथा देखभाल के अधिकार का समर्थन करने के लिए आयुष्मान खुराना का आभार भी जताया।
दौरे के दौरान आयुष्मान खुराना और UNICEF India Deputy Representative (Programmes) ने जालना के जिला कलेक्टर से भी मुलाकात की। इस दौरान बच्चों और परिवारों पर कार्यक्रम के प्रभाव पर चर्चा हुई और पहल के परिणामों की सराहना की गई।
आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में जालना जिले के छह ब्लॉकों में 649 Youth Volunteers काम कर रहे हैं। वहीं, 2014 से परिवार आधारित वैकल्पिक देखभाल में बच्चों के बने रहने का अनुपात लगातार बढ़ा है। 258 पायलट गांवों में यह आंकड़ा अब 60.23 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इस मॉडल को आगे बढ़ाते हुए जिला कलेक्टर और महाराष्ट्र सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग की State Migration Committee के नेतृत्व में इसे 198 अतिरिक्त गांवों तक विस्तारित किया गया है।
कार्यक्रम के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 के दौरान 5,800 से ज्यादा बच्चे Kinship Care में बने रहे, जबकि उनके माता-पिता सीज़नल काम के लिए बाहर प्रवास कर गए थे। इनमें से ज्यादातर बच्चों की देखभाल उनके दादा-दादी ने की। कुछ बच्चे अन्य विस्तारित रिश्तेदारों या भरोसेमंद समुदाय के सदस्यों के साथ रहे।
इस व्यवस्था का असर केवल बच्चों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। इन हस्तक्षेपों से स्कूल से अनुपस्थिति और ड्रॉपआउट कम करने में मदद मिली है। साथ ही बच्चों को पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं से लगातार जोड़े रखने, सुरक्षित मनोसामाजिक वातावरण उपलब्ध कराने और बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा किशोर गर्भधारण के जोखिम को कम करने में भी मदद मिली है।
जालना का यह मॉडल दिखाता है कि जब परिवार, गांव का समुदाय, स्थानीय प्रशासन और सरकार एक साथ काम करते हैं, तो सीज़नल माइग्रेशन जैसी चुनौती के बीच भी बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और सुरक्षा को जारी रखा जा सकता है। सबसे अहम बात यही है कि माता-पिता के काम के लिए बाहर जाने की मजबूरी बच्चों के भविष्य में रुकावट न बने।
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