कोई कहता है पिछले जन्म का पाप, तो कोई करता है झाड़-फूंक, जानें कौन सी बीमारी पैरों को कर देती है हाथी की तरह

Published : Dec 18, 2021, 01:04 PM IST

हेल्थ डेस्क : पूरी दुनिया में तरह-तरह की बीमारियां फैली हुई है। लेकिन कम ज्ञान के चलते कुछ बीमारियों को लोग पिछले जन्म का पाप तक कह देते हैं और इससे निजात पाने के लिए तरह-तरह के झाड़ फूंक तक करते हैं। इसी तरह की एक बीमारी है जिसे लिम्फैटिक फिलारयासिस (Lymphatic Filariasis) या एलिफन्टाइसिस (Elephantiasis), जिसे आम भाषा में फीलपांव या हाथीपांव के नाम से भी जाना जाता है। यह एक संक्रमित रोग है जो मादा मच्छर के काटने से होता है। इसमें इंसान का एक या दोनों पैर हाथी के पैर जैसे मोटे हो जाते हैं। कहा जाता है कि जिन जगहों पर जल का प्रभाव ज्यादा होता है, जहां बारिश ज्यादा होती है या ठंड ज्यादा होती है, वहां पर इस तरह की बीमारियां ज्यादा पाई जाती हैं। आइए आज आपको बताते हैं फाइलेरिया के बारे में...

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कोई कहता है पिछले जन्म का पाप, तो कोई करता है झाड़-फूंक, जानें कौन सी बीमारी पैरों को कर देती है हाथी की तरह

यह बीमारी फाइलेरिया बोनक्राफ्टी नामक एक कीटाणु कारण होती है, इसलिए इसको फाइलेरिया भी कहते हैं। इसके अलावा यह क्यूलेक्स मच्छर के काटने से भी फैलाई है। यह परजीवी धागे की तरह होता है और इसका संक्रमण लसिका (लिम्फ) ग्रंथियों में होता है। यह लसीका में ही मर जाते हैं और लसीका मार्ग बंद कर देते हैं, जिससे लसीका अपना काम बंद कर देती है और वो जगह फूलती जाती है।

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WHO के अनुसार, दुनियाभर में 52 देशों में 856 मिलियन लोग इस रोग से पीड़ित हैं। वहीं, भारत में ये बीमारी ज्यादातर बिहार, बंगाल, पूर्वी प्रान्तों, केरल और मलाबार प्रदेशों में पाई जाती है। अधिकतर मामलों में कम ज्ञान के कारण लोगों को इसके लक्षणों को पता नहीं चल पाता है, जिससे इलाज में मुश्किल हो सकती है।

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डॉक्टर्स की माने तो फाइलेरिया बीमारी का संक्रमण आमतौर से बचपन में होता है। मगर इस बीमारी के लक्षण 7 से 8 साल के बाद ही दिखाई देते हैं। जो मच्छर फ्युलेक्स एवं मैनसोनाइडिस प्रजाति के होते हैं, वह एक धागे के समान परजीवी को छोड़ता है। यह परजीवी हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है। प्रत्येक मादा वयस्क फाइलेरिया परजीवीन नर कृमि से जुड़ने के बाद, लाखों सूक्ष्मफाइलेरिया नामक भ्रूणों की पीढ़ियों को जन्म देती है। ऐसा मच्छर जब अन्य स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तब सूक्ष्म भ्रूणों का स्वस्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश होता है। इस प्रकार बीमारी का फैलाव होता रहता है।

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इस बीमारी का सबसे बड़ा लक्षण ये है कि इसमें संक्रमित व्यक्ति के हाथ और पैरों में सूजन आ जाती है और ये सामान्य आकार से ज्यादा मोटे हो जाते हैं। अधिकतर मामलों में प्रभावित हिस्से की त्वचा ज्यादा शुष्क और मोटी हो जाती है। इतना ही नहीं इसमें बेचैनी होना आम बात है और जैसे-जैसे यह रोग बढ़ता रहता है रोगी को बुखार और ठंड लगना भी शुरू हो जाता है। इस बीमारी से पीड़ित महिलाओं को स्तनों में सूजन भी आने लगती है।

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कई लोगों का मनाना होता है, कि हाथीपांव एक खानदानी बीमारी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आपके परिवार में बढ़ती जाती है। कोई तो इसे पिछले जन्म के पाप भी कहता है। लोगों का मानना है, कि इससे मनुष्य की प्रजनन शक्ति पर भी असर पड़ता है, जबकि ये सभी मिथक है।
 

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डायथाइल्कार्बामाजीन (डीईसी) हाथीपांव की बीमारी में आमतौर पर दी जाने वाली दवा है, लेकिन इसका सेवन डॉक्टर्स के परामर्श के बाद ही करना चाहिए। यह दवा माईक्रोफिलेरिया को मारता हैं और एक व्यक्ति से दूसरे में संक्रमण फैलने से रोकने में मदद करता हैं। 

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हाथीपांव के मरीज अपने बढ़े हुए पैर को साधारण साबुन व साफ पानी से रोज धोएं।
एक मुलायम और साफ कपड़े से ही अपने पैर को पोंछें। याद रखें कि पैर की सफाई करते समय ब्रश का प्रयोग न करें, इससे पैरों पर घाव हो सकते हैं। इसके अलावा आप नियमित व्यायाम भी करें।

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