Published : May 13, 2020, 11:53 AM ISTUpdated : May 13, 2020, 02:35 PM IST
हटके डेस्क: पृथ्वी इन दिनों कोरोना के कहर से त्रस्त है। इस जानलेवा वायरस ने दुनिया के कई देशों को लाश के ढेर में बदल दिया है। 2020 को लेकर कई लोगों का कहना है कि दुनिया की तबाही लेकर ही ये साल आया है। कोरोना के कहर के बीच ही न्यूजीलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ कैंटरबरी के एस्ट्रोनॉमर्स ने एक ग्रह का पता लगाया है, जो हूबहू पृथ्वी की तरह दिखता है। इसे मिल्की वे गैलेक्सी के बीच में स्पॉट किया गया। ये पृथ्वी और नेप्च्यून के बीच में कहीं पड़ता है। अंदाज के मुताबिक, ये ग्रह पृथ्वी से 25 हजार लाइट ईयर की दूरी पर है। इस खबर के सामने आने के बाद लोगों में चर्चा होने लगी है कि क्या कोरोना से तबाही के बाद लोग इस ग्रह पर रह पाएंगे?
इस स्टार को मिल्की वे गैलेक्सी के बीच गैलेक्टिक बल्ज के बीच ढूंढा गया। देखने में ये पथरीले ग्रह पृथ्वी सा ही लगता है। ये सूरज से दस गुना छोटा है। अभी तक इस ग्रह का कोई नाम डिसाइड नहीं किया गया है लेकिन इसकी खोज का नेतृत्व करने वाले माइक्रोलेंसिंग इवेंट को OGLE-2018-BLG-0677 कहा गया है।
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पृथ्वी से 25 हजार लाइट ईयर की दुरी पर मिले इस ग्रह को एक्सो प्लेनेट भी कहा जाता है। अभी तक एस्ट्रोनॉमर्स ने 4 हजार से भी कम एक्सो प्लेनेट ढूंढे हैं। इसमें से और भी कम हैं, जो पृथ्वी जैसे दिखते हैं।
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पृथ्वी से इस स्टार की दूरी इतनी ज्यादा है कि अभी तक ये पता नहीं लगाया जा सका है कि इसका तापमान कितना है। या फिर इस स्टार का नेचर क्या है?
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न्यूजीलैंड के साइंटिस्ट्स के मुताबिक, ऐसे स्टार का मिलना 1 मिलियन डिस्कवरी में 1 बार ही होता है। ये अपने आप में बड़ी खोज है।
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टीम की मेंबर डॉ हर्रेरा मार्टिन ने बताया कि उन्हें पांच दिन लगे इस होस्ट स्टार को ओब्सर्व करने में। पांच दिन के बाद उन्हें अहसास हुआ कि दूर से एक बिंदी जैसी दिख रही ये चीज असल ग्रह है।
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मार्टिन ने बताया कि अब टीम इस ग्रह का नेचर पता करने में जुटी है। इस ग्रह का तापमान क्या है और यहां इंसान रह पाएगा या नहीं?
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अभी तक के शोध में ये बात सामने आई है कि इस प्लेनेट पर 617 दिन में 1 साल पूरा होता है। मार्टिन ने आगे बताया कि अभी तक के शोध में ये ग्रह पृथ्वी से काफी मिलता-जुलता है।
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इस ग्रह की ग्रेविटी पर भी शोध चल रहा है। मार्टिन ने आगे कहा कि ग्रह और उसके मेजबान तारे के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण ने प्रकाश को अधिक दूर के पृष्ठभूमि वाले तारे से एक विशेष तरीके से बढ़ाया है। साथ ही उन्होंने लाइट ईयर को मापने के लिए दुनिया भर में दूरबीनों का उपयोग किया।
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इस प्लेनेट को जिस प्रक्रिया से ढूंढा गया है, वो माइक्रोलेंसिंग प्रभाव दुर्लभ है, जो किसी भी समय में आकाशगंगा में लगभग एक लाख सितारों में से एक ही प्रभावित होता है। इसके अलावा, इस प्रकार का अवलोकन दोहराता नहीं है, और एक ही समय में एक ग्रह को पकड़ने की संभावनाएं बहुत कम हैं।
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