
What Does the Moon Smell Like: रात के आसमान में चमकता चांद हमें दूर से शांत और सूना नजर आता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चांद की सतह पर जाकर वहां की मिट्टी की गंध कैसी महसूस होती होगी? अपोलो मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने इसका हैरान करने वाला अनुभव साझा किया था।
1969 के अपोलो 11 मिशन के दौरान नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज एल्ड्रिन ने पहली बार चांद की सतह पर कदम रखा। मिशन से पहले वैज्ञानिकों को यह चिंता थी कि चांद की जमीन कहीं इतनी नरम न हो कि लैंडर के पैर उसमें धंस जाएं। हालांकि, चांद की सतह उम्मीद के मुताबिक ठोस मिली।
चांद की सतह पर मौजूद मिट्टी बेहद महीन और चिपकने वाली होती है। अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेससूट पर यह धूल आसानी से चिपक गई और उनके साथ लूनर मॉड्यूल के अंदर भी पहुंच गई। यहीं से शुरू हुआ चांद की रहस्यमयी गंध का अनुभव।
लूनर मॉड्यूल के अंदर हवा का दबाव सामान्य होने के बाद अंतरिक्ष यात्रियों ने अपने स्पेससूट पर लगी चांद की धूल की गंध महसूस की। उन्होंने इसकी तुलना गीली राख और पटाखे फोड़ने के बाद आने वाली जलने जैसी गंध से की थी। यह अनुभव उनके लिए काफी असामान्य था।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चांद की सतह पर मौजूद धूल और चट्टानें लंबे समय तक अंतरिक्ष के बेहद कठोर वातावरण के संपर्क में रहती हैं। वहां हवा या नमी नहीं होने के कारण सतह पर मौजूद कणों का व्यवहार पृथ्वी की मिट्टी से काफी अलग होता है। मॉड्यूल के अंदर ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इन कणों से अलग तरह की गंध महसूस हो सकती है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि चांद से लाए गए मिट्टी और चट्टानों के नमूनों की जांच पृथ्वी पर की गई, लेकिन वैज्ञानिक उस गंध को दोबारा महसूस नहीं कर सके। नमूने सीलबंद कंटेनरों में सुरक्षित लाए गए थे और खोलने तक वह खास गंध गायब हो चुकी थी।
अपोलो मिशन से जुड़े इस अनुभव को लेकर लेखक चार्ल्स फिशमैन ने भी दिलचस्प टिप्पणी की थी। उनका सार यही था कि अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद पर जिस गंध को महसूस किया, वह धरती तक नहीं आ सकी। यानी चांद की मिट्टी की वह रहस्यमयी खुशबू आज भी उसके साथ ही जुड़ा एक अनोखा रहस्य है।