जलियांवाला बाग हत्याकांड: दशकों बाद भी नहीं भरे जख्म, हजारों लोगों पर चलाईं गई थी अंधाधुंध गोलियां

Published : Mar 24, 2022, 01:21 PM IST
जलियांवाला बाग हत्याकांड: दशकों बाद भी नहीं भरे जख्म, हजारों लोगों पर चलाईं गई थी अंधाधुंध गोलियां

सार

देश की आजादी के 75 साल पूरे हो चुके हैं।  इस अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। इसी कड़ी में एशियानेट हिंदी आजादी से जुड़ी हुई कहानियां आप तक ला रहा है। आज हम आपको जलियांवाला बाग हत्याकांड के बारे में बताएं, जिसने भारतीयों को कभी न भरने वाला जख्म दिया।

नई दिल्ली। भारत अपनी आजादी का 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह आजादी यूं ही नहीं मिली। आजादी पाने में लाखों लोगों ने अपनी जानें न्योछावर कर दी। आजादी की लड़ाई के दौरान कुछ ऐसी भी घटना हुईं, जिन्होंने भारतीयों को सदियों तक न भरने का जख्म दिया। ऐसी ही एक घटना 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh Massacre) में घटी। इस घटना से भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत हुई थी।

रोलैक्ट एक्ट का पूरे देशभर में हुआ विरोध
प्रथम विश्व युद्ध के दरम्यान ब्रिटिश सेना में शामिल 75 हजार भारतीय सैनिक शहीद हुए थे।  इतिहासकारों की मानें तो प्रथम विश्वयुद्ध में 11 लाख से अधिक भारतीय सैनिक शामिल हुए थे। विश्वयुद्ध में शामिल होने वाले सैनिकों को यह समझ में आ गया था कि देश का क्या मतलब है। सैनिकों के बीच राष्ट्रवाद और देशभक्ति की ज्वाला धधक उठी थी, जिसके बाद अंग्रेजों को डर सताने लगा कि यदि इन सैनिकों ने विद्रोह कर दिया तो इन्हें रोकना मुश्किल होगा। 

इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के बदलते माहौल को भांपते हुए एक नया कानून बनाने पर विचार किया। यह नया कानून रोलैक्ट एक्ट (Rowlatt Act) के रूप में सामने आना था। ब्रिटिश सरकार ने 10 मार्च 1919 को रोलैक्ट एक्ट पारित किया, जिसे काला कानून और बिना वकील, अपील, दलील वाला कानून कहा जाता है। इस कानून का पूरे देश में विरोध हुआ। 

सत्यपाल-सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में आयोजित हुई थी सभा
अमृतसर में रोलैक्ट एक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व डॉ सत्यपाल मलिक और डॉ. सैफुद्दीन किचलू ने किया। विरोध प्रदर्शन को देखते हुए 10 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश सरकार ने दोनों नेताओं को धोखे से गिरफ्तार कर लिया और गिरफ्तार करने के बाद उन्हें धर्मशाला भेज दिया गया। इतना ही नहीं अंग्रेजों ने महात्मा गांधी को पंजाब में घुसने नहीं दिया और मुंबई वापस भेज दिया। 

दस अप्रैल को जनता ने निकाला मार्च
डॉ सत्यपाल मलिक और डॉ. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी की खबर से अमृतसर के लोगों में गुस्सा था। दस अप्रैल को नेताओं की रिहाई की मांग करते हुए पचास हजार की संख्या में लोग एकत्रित हुए और एक मार्च निकाला। इस मार्च के दौरान सैनिकों से उनकी मुठभेड़ भी हुई। पथराव और गोलीबारी हुई, जिसमें कई लोगों की मौत भी हो गई। 

10 मिनट तक हुई थी गोलीबारी
इसके बाद डॉ सत्यपाल मलिक और डॉ. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा आयोजित हुई। उस दिन क्या हुआ, आज हर किसी को मुंहजबानी पता है। बाग में हजारों लोग इकट्ठा हुए थे और ब्रिटिश अधिकारी जनरल ओ डायर बिना किसी पूर्व चेतावनी के निहत्थे लोगों पर गोली चलवा दी। यह गोलीबारी तकरीबन 10 मिनट तक चली और पूरे बाग में लाशें बिछ गईं।

जान बचाने के लिए कूएं में कूद गए लोग
जान बचाने के लिए लोग इधर-उधर भागने लगे। भगदड़ में ही कई लोगों की मौत हुई। एक के ऊपर एक कई लाशें बिछ गईं। कुछ लोग तो जान बचाने के लिए बाग में स्थिति कुएं में कूद गए। इस घटना में हजारों निर्दोश लोग मारे गए। हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो इस घटना में 379 लोगों की मौत हुई थी। इतिहासकारों का कहना है कि इस घटना के दौरान कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं थीं। 

घटना के विरोध में रविंद्र नाथ टैगौर समेत कई लोगों ने उपाधियां त्यागी
बता दें जिस दिन यह घटना हुई, वह दिन वैशाखी का दिन था। इस घटना को लेकर पूरा देश स्तब्ध हो गया। हत्याकांड के विरोध में रविंद्र नाथ टैगौर समेत कई लोगों ने उपाधियां त्यागी। इस घटना को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का टर्निंग पॉइंट कहा जाता है। कई इतिहासकारों का मानना है कि इस घटना के बाद भारत पर शासन करने के लिए अंग्रेजों के नैतिक दावे का अंत हो गया। 

पन्ने दर पन्ने सरकारी लीपापोती 
इस घटना को लेकर पूरी दुनिया में ब्रिटिश हूकूमत की किरकिरी हुई, जिसके बाद अंग्रेजी सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष के चलते इस घटना की जांच करने के लिए तहकीकात और हंटर नामक समिति गठित की गई। हालंकि, हंटर समित ने अपनी रिपोर्ट में जनरल डायर को निर्दोष करार दिया था। इस रिपोर्ट को महात्मा गांधी ने पन्ने दर पन्ने सरकारी लीपापोती बताया था।  

21 साल बाद उधम सिंह ने लिया बदला
इस हत्याकांड का बदला 21 साल बाद 1940 में उधम सिंह ने लिया था। उधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन की रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी के हाल में माइकल ओ डायर की गोली मारकर हत्या कर दी थी। हालांकि, इस दौरान उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और 31 जुलाई को डायर की हत्या के आरोप में उन्हें फांसी की सजा दी गई। इतिहासकारों की मानें तो जलियांवाला बाग हत्याकांड में उधम सिंह के कई अपने शहीद हुए थे, जिसके बाद से उधम सिंह ने इस घटना का बदला लेने का प्रण ले लिया था। भारत सरकार ने 1961 में जलियांवाला बाग नरसंहार में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए वहां एक स्मारक का निर्माण करवाया।

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