India@75: कौन थे भारत में सामाजिक क्रांति के अगुआ ज्योतिबा फूले, कैसे तोड़ी थी जाति की जर्जर जंजीरें

Published : Aug 14, 2022, 02:29 PM IST
India@75: कौन थे भारत में सामाजिक क्रांति के अगुआ ज्योतिबा फूले, कैसे तोड़ी थी जाति की जर्जर जंजीरें

सार

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Indian freedom movement) के दौरान कई क्रांतिकारी ऐसे भी रहे जिन्होंने भारत में सामाजिक भेदभाव के खिलाफ भी लड़ाईयां लडीं। महात्मा ज्योतिबा फूले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फूले इन्हीं से से एक थे। 

नई दिल्ली. भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन करने वालों में से कुछ ने परोक्ष रूप से भारतीय लोगों के आत्मविश्वास को जगाने का काम किया था। उनमें सबसे अविस्मरणीय नाम है महात्मा ज्योतिबा फुले का, जिन्हें भारतीय सामाजिक क्रांति का जनक भी कहा जाा है। ज्योतिबा फूले पिछड़े समुदायों के अधिकारों के लिए काम करने वालों में से एक थे। बाबा साहेब अम्बेडकर के लिए भी महात्मा फूले मार्गदर्शक थे। फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई दोनों ने हीं महिला शिक्षा के क्षेत्र में काम किया था। यही महात्मा फूले थे जिन्होंने दलित शब्द का परिचय दिया। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। सावित्रीबाई फुले प्रसिद्ध कवियत्री थीं।

कौन थे महात्मा फूले
महात्मा ज्योतिबा फूले का जन्म 1827 में महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। वे पिछड़े जाति के माली समुदाय में पैदा हुए थे जो सब्जियों और फूलों के उत्पादक थे। ज्योतिबा ने स्कॉट मिशन स्कूल में पश्चिमी शिक्षा प्राप्त की, जिसने उनके विचारों को नया आकार दिया। सावित्री से उनकी शादी 13 साल की उम्र में हुई थी और तब वह सिर्फ 9 साल की थीं। ज्योतिबा के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब वे अपने ब्राह्मण मित्र की शादी में शामिल हुए। ज्योतिबा को पिछड़ी जाति का होने के नाते वहां अपमान सहना पड़ा। इस अनुभव ने ज्योतिबा को जाति व्यवस्था के घोर अन्याय से अवगत करा दिया और उन्होंने इसे बदलने की ठान ली। 

कैसे आगे बढ़ा मिशन
ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित एक गर्ल्स स्कूल में ज्योतिबा की यात्रा ने उनकी दुनिया को और बड़ा कर दिया। मनुष्य के अधिकारों को पढ़ना, समानता पर अमेरिकी लेखक थॉमस पेन द्वारा लिखित क्लासिक ने उन्हें क्रांतिकारी बना दिया। तब उनका पहला कदम था अपनी अनपढ़ पत्नी सावित्री को पढ़ना-लिखना सिखाना। इसके बाद फुले और सावित्री ने महिलाओं की शिक्षा के लिए काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने विश्रामबाग वाडा, पुणे में लड़कियों के पहले स्कूल की स्थापना की और रूढ़िवादी वर्गों से बड़ी शत्रुता का सामना भी किया। फुले के पिता ने उन्हें और मनुस्मृति संहिता के नियम तोड़ने पर घर छोड़ने के लिए कहा। तब फूले को मुस्लिम मित्रों ने शरण दी और उन्होंने अपने मिशन को आगे बढ़ाना जारी रखा। 

समाज में समता का प्रचार
महात्मा ज्योतिबा फूले ने पिछड़ी जातियों के लिए स्कूल शुरू किए। उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की जिसने अस्पृश्यता के उन्मूलन का आह्वान किया। फुले और सावित्री ने खुले तौर पर बाल विवाह का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह की वकालत की। उन्होंने उन बच्चियों के लिए अनाथालय खोले, जिन्हें उनके परिवारों ने छोड़ दिया था। कई पिछड़ी जाति के नेताओं की तरह फुले ने भी अपनी पुस्तक गुलामगिरी में ब्रिटिश सरकार और ईसाई मिशनरियों को हिंदू जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं देने के लिए धन्यवाद दिया। उनका मानना ​​​​था कि पश्चिमी आधुनिकता पिछड़ी जातियों के लिए उच्च जाति के आधिपत्य से बचने और अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है। फुले ने पैगंबर मोहम्मद पर भी एक किताब भी लिखी थी।

कैसे हुआ दोनों का निधन
ज्योतिबा फूले ने पिछड़ी जातियों के लिए मॉडल स्थापित करते हुए कई काम किए। वे 1876 से सात साल तक पुणे के नगर आयुक्त रहे। 1890 में बॉम्बे में उनका निधन हो गया। 19 वीं शताब्दी के अंत में महाराष्ट्र बुबोनिक प्लेग महामारी की चपेट में आ गया था। सावित्रीबाई और उनके दत्तक पुत्र यशवंत ने पीड़ितों के लिए क्लिनिक खोला थी। प्लेग से पीड़ित पिछड़ी जाति के बच्चे को अपने हाथों में लेने की वजह से उन्हें भी यह बीमारी लग गई और 10 मार्च 1897 को 66 साल की उम्र में सावित्रीबाई का भी निधन हो गया। 

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