
नई दिल्ली. भारतीय आधुनिक रसायन विज्ञान के जनक पीसी रे प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक भी थे। जिन्होंने राष्ट्र के स्वाभिमान और राष्ट्रवादी जागरण को प्रेरित किया। पश्चिम के अनुसार भारत लंब समय तक अंधविश्वास और रूढ़िवाद का केंद्र था। तब आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे यानी सर पीसी रे ने भारत के लोगों के अंधविश्वास को खत्म करने का काम किया और आत्म सम्मान की भावना विकसति करने में मदद की।
अंग्रेजों के समय के महान विद्वान
भारतीय आधुनिक रसायन विज्ञान के जनक पीसी रे तब जेसी बोस के साथ पहले भारतीय वैज्ञानिक थे जिन्हें पश्चिम के देश भी पहचानने को मजबूर हुए। रॉयल सोसाइटी आफ केमिस्ट्री का सर्वोच्च पुरस्कार जीतने वाले वे पहले गैर-यूरोपीय विद्वान थे। वे शिक्षाविद् होने के साथ ही इतिहासकार, व्यापार उद्यमी, परोपकारी और सबसे बढ़कर वह एक उत्साही राष्ट्रवादी थे। उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारियों के समर्थन भी किया। उन्हें एक वैज्ञानिक के वेश में क्रांतिकारी करार दिया गया था। वे गांधी जी के भी निकट सहयोगी रहे थे।
पहली दवा कंपनी के संस्थापक
पीसी से भारत की पहली दवा कंपनी के संस्थापक थे। जिसका नाम बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स था। 1892 में पीसी रे ने 700 रुपये के निवेश के साथ कंपनी शुरुआत की थी, जो अब 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करती है। वह सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी है। पीसी रे हिस्ट्री ऑफ द हिंदू केमिस्ट्री के लेखक थे।
कौन थे पीसी रे
बंगाली पुनर्जागरण के बाद पीसी रे का जन्म पूर्वी बंगाल के जेसोर में प्रबुद्ध जमींदार परिवार में हुआ था। जो कि अब बांग्लादेश में है। उनके माता-पिता दोनों शिक्षित थे और बंगाली पुनर्जागरण के ध्वजवाहक ब्रह्मसमाज के अनुयायी थे। उन्होंने न केवल अपने बेटों को बल्कि बेटियों को भी अंग्रेजी शिक्षा के लिए विदेश भेजा। प्रफुल्ल ने केशुब चंद्र सेन और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे पुनर्जागरण नेताओं द्वारा स्थापित स्कूलों में अध्ययन किया। उनके शिक्षकों में सुरेंद्रनाथ बनर्जी थे, जो बाद में प्रमुख राष्ट्रवादी नेता और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने।
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बने
कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रफुल्ल को सर अलेक्जेंडर पेडलर द्वारा रसायन विज्ञान और प्रयोगों की दुनिया से अवगत कराया गया। अपनी डिग्री पूरी करने से पहले ही प्रफुल्ल को ब्रिटेन के एडिनबर्ग यूटी में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति मिली। 21 साल की उम्र में वे 1882 में लंदन चले गए। विश्वविद्यालय में उनके प्रोफेसर अलेक्जेंडर क्यूरम ब्राउन थे, जिन्होंने अकार्बनिक रसायन विज्ञान और नाइट्राइट्स विज्ञान में रुचि जगाई। इंग्लैंड में वह मिले और जेसी बोस के मित्र बन गए जो कैम्ब्रिज में छात्र थे। बाद में वे भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक के रूप में उभरे। वे लंदन में रहते हुए भी राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे। वह एडिनबर्ग केमिकल सोसाइटी के उपाध्यक्ष बने और प्रतिष्ठित फैराडे पुरस्कार जीतकर कोर्स पूरा किया।
राष्ट्रीय आंदोलन में हुए शामिल
जब तक वे भारत वापस आए, तब तक रे अंग्रेजों की निगरानी सूची में पहुंच चुके थे। उन्हें भारतीय शिक्षा सेवा में प्रवेश से वंचित कर दिया गया और उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज में कम वेतन वाले अस्थायी शिक्षक के पद से संतुष्ट होना पड़ा। उन दिनों वे बोस के साथ रहते थे। उन्होंने बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के साथ घनिष्ठ संबंध जारी रखा। वे गांधी के खादी के कपड़ों की भौतिक गुणवत्ता पर उनके विचारों सहित विज्ञान के मुद्दों पर परामर्श करते थे। राय ने उन बंगाली क्रांतिकारियों का समर्थन करने में संकोच नहीं किया जबकि वे गांधीवादी अहिंसक पथ के अनुयायी थे।
मिली नाइटहुड की उपाधि
बाद में पीसी रे कलकत्ता के नए शुरू हुए यूनिवर्सिटी कालेज आफ साइंस में प्रोफेसर बन गए। तब पश्चिम को रे के योगदान को पहचानने के लिए मजबूर होना पड़ा। 1912 में डरहम कालेज ने उन्हें मानद उपाधि से सम्मानित किया। उन्होंने 1919 में नाइटहुड का खिताब भी प्राप्त किया। जीवन भर अविवाहित रहे रे ने अपनी अधिकांश संपत्ति राष्ट्रवादी, वैज्ञानिक और मानवीय उपक्रमों के नाम कर दिया। 1944 में अंतिम सांस लेने तक वे उत्साही राष्ट्रवादी बने रहे।
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