
नई दिल्ली. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रेरक अध्याय है जिसमें हिंदू सन्यासियों व मुस्लिम फकीरों ने हथियार उठाए और दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इसे भारत में सन्यासी-फकीर विद्रोह के रूप में जाना जाता है। यह 18वीं शताब्दी के दौरान बंगाल और बिहार के क्षेत्र में तीन दशकों तक चलने वाला बड़ा विद्रोह था। इस दौरान बंगाल में विनाशकारी अकाल भी आया जिसमें करीब 1 करोड़ लोग मारे गए। भूख और प्राकृतिक आपदा ने लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया। इसके बावजूद कंपनी सरकार ने जबरन टैक्स वसूलने शुरू किए थे। यह विद्रोह उसी शोषणकारी नीति के खिलाफ था।
कैसे शुरू हुआ आंदोलन
रामनामी भिक्षु और मुस्लिम फकीरों ने जो कि इसी क्षेत्र में भिक्षा मांगकर जीवन जीते थे, उन्हें भी बड़ी परेशानी झेलनी पड़ी। अकाल पड़ने से लोगों के पास खाने तक का अनाज नहीं बचा तो भिक्षा देने में भी लोग कतराने लगे। वहीं दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जबरन वसूली करते रहे। स्थानीय लोगों ने कंपनी अधिकारियों द्वारा जबरन वसूली का विरोध शुरू कर दिया। तब सन्यासियों और फकीरों ने भी हथियार उठा लिए और विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ उठ रही आक्रोशित जनता के साथ हो गए। तब पूरे बंगाल और बिहार में खूनी संघर्ष शुरू हो गया।
लूट लिया कंपनी का खजाना
अंग्रेज गवर्नर की दमनकारी नीति के बावजूद व्यापक विरोध जारी रहा। सन्यासी और फकीरों की टोली ने कंपनी के खजाने को लूट लिया। यहां तक कि अंग्रेज अधिकारियों को भी मार डाला गया। फकीरों ने औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों से गरीब ढाका के मलमल बुनकरों को भी लामबंद किया। लेकिन जमींदारों और विभिन्न क्षेत्रों के शासकों जैसे रानी चौधरानी, नदी युद्ध में दक्ष रानी ने भी विद्रोह का समर्थन किया। उफनती तीस्ता नदी में देशी नावों पर सवार विद्रोहियों ने कंपनी बलों पर अचानक हमले किए लेकिन आर्थिक और मानवीय संकट के इस समय में भी कंपनी के खजाने जमीन से जबरन वसूले गए धन से भरे हुए थे। सन्यासी फकीर विद्रोह को समाप्त करने में कंपनी को लगभग तीन दशक लग गए।
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