
उज्जैन. वैदिक ज्योतिष में इस योग को अत्यंत दुर्लभ माना गया है। वारुणी योग चैत्र माह में बनने वाला एक अत्यंत पुण्यप्रद महायोग कहा जाता है। इसका वर्णन विभिन्न पुराणों में भी मिलता है।
3 प्रकार का होता है ये योग
यह महायोग तीन प्रकार का होता है, चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को वारुण नक्षत्र यानी शतभिषा हो तो वारुणी योग बनता है। चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को शतभिषा नक्षत्र और शनिवार हो तो महावारुणी योग बनता है और चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को शतभिषा नक्षत्र, शनिवार और शुभ नामक योग हो तो महा-महावारुणी योग बनता है। इस बार केवल वारुणी योग बन रहा है।
इस योग का महत्व
वारुणी योग में गंगा आदि तीर्थ स्थानों में स्नान, दान और उपवास करने से करोड़ों सूर्य-चंद्र ग्रहणों में किए जाने वाले जप-अनुष्ठान के समान शुभ फल प्राप्त होता है। वारुणी योग के बारे में धर्मसिंधु शास्त्र में कहा गया है
चैत्र कृष्ण त्रयोदशी शततारका नक्षत्रयुता
वारुणी संज्ञका स्नानादिना ग्रहणादिपर्वतुल्य फलदा।
अर्थात् जब चैत्र कृष्ण त्रयोदशी के दिन शततारका यानी शतभिषा नक्षत्र हो तो वारुणी योग बनता है, जिसमें स्नानादि का फल ग्रहण काल में स्नान से ज्यादा मिलता है।
इस कारण बना वारुणी योग
22 मार्च को वारुणी योग सुबह 6 बजकर 32 मिनट से प्रारंभ होगा और इसी दिन प्रातः 10 बजकर 8 मिनट पर समाप्त हो जाएगा। इस दिन शतभिषा नक्षत्र है जो एक दिन पूर्व यानी 21 मार्च को सायं 7.38 बजे से प्रारंभ होकर 22 मार्च को रात्रि 10.25 बजे तक रहेगा। इस प्रकार वारुणी योग 3 घंटे 36 मिनट तक ही रहेगा।
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