
हेल्थ डेस्क: मेडिकल हिस्ट्री में एक महत्वपूर्ण पल तब आया, जब साल 1978 में इंग्लैंड में दुनिया का पहला टेस्ट-ट्यूब बेबी पैदा हुआ। उसी के कुछ महीनों बाद भारत का पहला और दुनिया का दूसरा टेस्ट-ट्यूब बेबी पैदा हुआ, जिसने भारत को बांझपन ट्रीटमेंट अपनाने वाले शुरुआती देशों में से एक बना दिया। पिछले 45 सालों में देश के फर्टिलिटी रेट (TFR) में बहुत ज्यादा गिरावट देखी गई है। जिसकी वजह से बांझपन की घटनाओं में वृद्धि और इसका ट्रीटमेंट चुनने वाले लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है।
बांझपन का कारण क्या है?
इस्टिमेट आंकड़ों के मुताबिक साल 2023 में लाइफटाइम इनफर्टिलिटी में 33-34 मिलियन कपल आजीवन बांझपन से पीड़ित रहेंगे। बांझपन में हो रही वृद्धि का मुख्य कारण लाइफस्टाइल में बदलाव, शादी की देरी और परिवार नियोजन की देर से शुरुआत के कारण हो रही है। इसके अलावा खराब न्यूट्रीशन, अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र में रहना, शराब का सेवन, तनाव और ऐसी अन्य कई स्थितियां बांझपन का कारण बनती हैं।
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इनफर्टिलिटी से जुड़े कई मिथ
बांझपन के साथ कई गलत धारणाएं जुड़ी हुई हैं। जैसे कि यह एक महिला की गलती है, केवल शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों में उनकी जीवनशैली के कारण ये स्थिति बनती है और यह कोई बीमारी नहीं है। रिसर्च के मुताबिक बांझपन से जूझने वाले लोग तनावग्रस्त, चिंतित होते हैं और अक्सर भेदभाव का सामना करते हैं। हालांकि भारत में सहायक प्रजनन तकनीक (ART) क्षेत्र में काम करने वालों के प्रयासों के माध्यम से इनमें से कई मिथकों का खंडन किया गया है।
आईवीएफ ट्रीटमेंट पर बढ़ रही जागरुकता
ग्रामीण क्षेत्रों में वैसे कई कार्यक्रम और जागरूकता अभियान के साथ ग्रामीण आबादी को आईवीएफ ट्रीटमेंट के अस्तित्व और लाभों के बारे में बताया जा चुका है। भारत में बांझपन उपचार की मांग में उछाल देखा जा रहा है। हर साल लगभग 3,000,000 आईवीएफ सर्कल आयोजित करने वाले 2,500 से अधिक प्रजनन क्लीनिक हैं। इन बढ़ती संख्याओं के साथ उपचार की प्रवेश दर 2% तक बढ़ गई है।
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