
यूरिक एसिड की समस्या आजकल एक आम हेल्थ प्रॉब्लम बन चुकी है। बदलती लाइफस्टाइल, गलत खानपान, स्ट्रेस और फिजिकल एक्टिविटी की कमी इसकी बड़ी वजह हैं। यह समस्या तब होती है जब शरीर में मौजूद प्यूरीन (Purine) नामक तत्व ज्यादा मात्रा में टूटता है और उसका बाय-प्रॉडक्ट यूरिक एसिड खून में बढ़ने लगता है। जब यूरिक एसिड का लेवल नॉर्मल सीमा से ऊपर चला जाता है तो यह शरीर के कई हिस्सों में जमा होने लगता है। इसके कारण गठिया (Gout), जोड़ों में सूजन और दर्द, किडनी स्टोन, थकान और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर जैसी गंभीर परेशानियां सामने आने लगती हैं। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर महिलाओं और पुरुषों में से किसे यूरिक एसिड का खतरा ज्यादा होता है? क्या यह समस्या किसी एक जेंडर में ज्यादा कॉमन है या दोनों के लिए बराबर रिस्क फैक्टर मौजूद हैं?
पुरुषों में एस्ट्रोजन (Estrogen) हार्मोन नहीं होता, जबकि महिलाओं में यह हार्मोन किडनी से यूरिक एसिड को बाहर निकालने में मदद करता है। इसलिए पुरुषों में यूरिक एसिड का लेवल ज्यादा बढ़ने की संभावना रहती है। वहीं पुरुष ज्यादातर रेड मीट, बीयर, फ्राइड स्नैक्स और नॉन-वेज ज्यादा खाते हैं, जिनमें प्यूरीन की मात्रा अधिक होती है। रिसर्च बताती है कि पुरुषों में अल्कोहल कंजम्पशन ज्यादा होता है, जो सीधे यूरिक एसिड को बढ़ाता है।
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मेनोपॉज के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल कम हो जाता है, जिससे यूरिक एसिड बाहर निकालने की क्षमता घट जाती है। इस वजह से इस उम्र के बाद महिलाओं को भी गाउट और हाई यूरिक एसिड की समस्या होने लगती है। प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ महिलाओं में यूरिक एसिड का स्तर असामान्य रूप से बढ़ सकता है, जिससे प्रे-एक्लेम्पसिया (Preeclampsia) जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।
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मेडिकल स्टडीज बताती हैं कि 35–60 साल की उम्र तक पुरुषों में यूरिक एसिड लेवल महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुना होता है। लेकिन मेनोपॉज के बाद महिलाएं भी बराबर रिस्क कैटेगरी में आ जाती हैं।
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