
हेल्थ डेस्क: हर साल 25 जुलाई को विश्व आईवीएफ दिवस मनाया जाता है। इसे लुईस ब्राउन के जन्म की याद में मनाया जाता है जो कि 1978 में सफल आईवीएफ थेरेपी के बाद पैदा हुए पहले बच्चे थे। आईवीएफ बांझपन चिकित्सा में एक मील का पत्थर बन गया है और गर्भधारण करने के इच्छुक कपल के लिए आशा की किरण है। हालांकि आईवीएफ थेरेपी हमेशा सफल नहीं होती है और इसका कपल पर शारीरिक और मानसिक प्रभाव पड़ सकता है। कई प्रयासों के बावजूद, माही विज, पायल रोहतगी, संभावना सेठ और अमृता राव जैसी कई हस्तियों ने आईवीएफ के माध्यम से बच्चा पैदा करने में अपनी समस्याओं पर चर्चा की है।
विशेषज्ञ के अनुसार बार-बार आईवीएफ फेल होने के कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे एक महिला की उम्र बढ़ती है, उसकी अंडाणु की मात्रा और गुणवत्ता प्रभावित होती है। बांझपन के कुछ कारणों में काम या साथियों के दबाव के कारण देर से शादी करना, साथ ही बच्चे पैदा करने में देरी शामिल है। डॉक्टर्स के अनुसार मोटापा, धूम्रपान और तनाव ये सब वो कारण है जिससे सभी अंडाणु, शुक्राणु और भ्रूण की गुणवत्ता से समझौता होता है। इससे आईवीएफ विफलता हो सकती है। एंडोक्रिनोलॉजिकल कारक और इम्युनोलॉजिकल कारक भी साथ-साथ चलते हैं।बार-बार आईवीएफ विफलता को संबोधित करने के लिए विशेषज्ञों की एक बहु-विषयक टीम की आवश्यकता होती है।
कपल को किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
कपल में अब आईवीएफ प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण सफलता रेट की अगर भविष्यवाणी की जाती है, तो यह केवल 50-60% है। परिणामस्वरूप कपल्स को आईवीएफ थेरेपी की सफलता बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए। डॉक्टर्स का कहना है कि प्रत्यारोपण एक बहुत ही रहस्यमय प्रक्रिया है जो शरीर के भीतर होनी चाहिए और बहु-तथ्यात्मक है। सफलता का श्रेय किसी एक कारक को नहीं दिया जा सकता है। उन्होंने सफलता दर बढ़ाने के लिए तनाव कम करने, स्वस्थ जीवन शैली जीने और वजन कम करने की सलाह दी है।
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