
रिलेशनशिप डेस्क: लार्सन एंड टूब्रो के चेयरमैन एस एन सुब्रह्मण्यन का सप्ताह में 90 घंटे काम करने का बयान किसी भी वर्किंग व्यक्ति की दुखती नब्ज में हाथ रखने जैसा है। जहां मेंटल हेल्थ को दुरस्त करने के लिए सप्ताह में तीन दिन छुट्टी की बात पर जो दिया जा रहा है वहां ऐसा बयान बहुत अखरता है। सप्ताह में तय घंटों के बावजूद लोग एक्सट्रा आवर काम कर रहे हैं। ऐसे में परिवार को समय न दे पाने का मलाल उन्हें हमेशा रहता है। अगर कोई व्यक्ति 90 घंटे काम करेगा तो उसकी मेंटल हेल्थ और फैमिली टाइम के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। जानिए क्यों किसी भी इंसान के परिवार के लिए सप्ताह की छुट्टियां मायने रखती हैं।
वीक ऑफ या छुट्टी का दिन हर एक इंसान के जीवन में बहुत मायने रखता है। एक छुट्टी ही होती है जिस दिन व्यक्ति खुद को रीचार्ज करता है ताकि अगले पूरे सप्ताह वो खुद को मजबूत बना सके। वीक ऑफ व्यक्ति को मेंटली के साथ ही फिजकली रिलेक्स देता है। कहते हैं कि मशीन को भी लगातार चलाने के बाद कुछ रिलेक्स दिया जाता है। फिर व्यक्ति के लिए कैसे बिना रुके काम करना संभव है?
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एक अच्छा रिलेशनशिप सौ मर्ज की दवा बराबर होता है। एस एन सुब्रह्मण्यन ने कहा कि ‘आखिर घर बैठकर कितनी देर तक पत्नी को घुरोगे’। यकीन मानिए सप्ताह अवकाश में पत्नी के साथ बिताए क्वालिटी टाइम से न सिर्फ तनाव दूर कर देता है बल्कि नए चैलेंज के लिए तैयार भी करता है। बच्चों और परिवार के साथ साथ में खाना, घूमने जाना बॉडी रिचार्ज जैसा होता है। बिना वीक ऑफ के करने की कल्पना बेकार है।
अगर वर्क लाइफ और फैमिली लाइफ बैलेंस रहती है तो व्यक्ति की प्रोडक्टिविटी अपने आप बढ़ जाती है। अगर बिना छुट्टी लिए इंसान काम ही करता रहेगा तो उससे अच्छी प्रोडक्टिविटी की उम्मीद करना बेकार है। सप्ताह में छुट्टी लेना और उसे एंजॉय करना किसी भी इंसान का हक होता है। इसे विलासिता का नाम नहीं दिया जा सकता।
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