
नई दिल्ली। देश को आजाद हुए 75 साल हो गए हैं। आजादी की लड़ाई में कुछ युवा क्रांतिकारियों का बलिदान इतना उद्वेलित करने वाला था कि उसने पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम का रूख बदलकर रख दिया। इनमें एक नाम खुदीराम बोस (Khudiram Bose) का है। उस समय उनकी उम्र महज 18 साल कुछ महीने महीने थी। अंग्रेज सरकार उनकी निडरता और वीरता से इस कदर आतंकित थी कि कम उम्र के बावजूद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। भारत का यह वीर सपूत हाथ में गीता लेकर खुशी-खुशी फांसी चढ़ गया था।
खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया था। खुदीराम बोस 9वीं कक्षा में ही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 1905 में ब्रिटिश हुकूमत ने बंगाल का विभाजन का कर दिया था। इसका विरोध पूरे देश में हुआ। खुदीराम बोस ने भी विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।
17 साल की उम्र में पहली बार गए जेल
खुदीराम बोस की निडरता और आजादी के लिए उनका जज्बा अंग्रेजी हूकूमत को खड़कने लगा था। बोस को 28 फरवरी 1906 को 17 साल की उम्र में पहली बार गिरफ्तार किया गया था, लेकिन वह जेल से भाग गए। 2 महीने बाद अप्रैल में वह फिर पकड़े गए थे। 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया था।
बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर किया हमला
6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया था, लेकिन गवर्नर बाल बाल बच गया। 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन वह भी बच गए।
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खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर की सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे, जिसने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी। इसके बाद साथी प्रफुल्लचंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई और 1908 में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी ने मिलकर किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका, हालांकि इस गाड़ी में किंग्सफोर्ट मौजूद नहीं थी, बल्कि अन्य अंग्रेज अधिकारी मौजूद थे। उनकी मौके पर मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पुलिस ने इन दोनों को घेर लिया था।
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प्रफुल्ल चाकी ने खुद को मार ली थी गोली
खुद को घिरता देख प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मार ली थी। खुदीराम बोस पकड़े गये, जिन्हें बाद में फांसी दे दी गई। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। खुदीराम बोस फांसी की सजा पाने वाले सबसे कम उम्र के कांतिकारी थे तब उनकी उम्र 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। देश के लिए शहीद होने के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहों ने उन्हें सम्मान देने के लिए एक खास किस्म की धोती बुनने का निर्णय किया, जिसपर खुदीराम लिखा होता था। खुदीराम की मौत पर विद्यार्थियों ने शोक जताया था। उनकी शहादत के कारण उस वक्त कई दिनों तक स्कूल बंद रहे थे।
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