
नई दिल्ली। 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान बिलकिस बानो (Bilkis Bano Case) के साथ गैंगरेप करने वाले 11 दोषियों को जेल से रिहा कर दिया गया था। दोषियों की रिहाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।कोर्ट ने गुजरात सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिहा हुए सभी दोषियों को पक्ष बनाया जाए। हम देखेंगे कि वे माफी के हकदार हैं या नहीं।
इस मामले में अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी। दरअसल, दोषियों को गुजरात सरकार ने स्वतंत्रता दिवस पर एक पुरानी छूट नीति के तहत रिहा किया था। इसके बाद बड़ा राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। सीजेआई एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की। दोषियों की रिहाई को चुनौती देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पोलित ब्यूरो सदस्य सुभाषिनी अली, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा और एक अन्य याचिकाकर्ता द्वारा तीन जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं।
कौन हैं बिलकिस बानो?
बिलकिस बानो गुजरात की रहने वाली हैं। 2002 के दंगों के बाद वो अपना राज्य छोड़कर कहीं और जाना चाहती थीं। उनके साथ उनकी 3 साल की बच्ची और परिवार के 15 अन्य सदस्य भी थे। तब गुजरात में हिंसा भड़की हुई थी। 3 मार्च, 2002 को दंगे के बाद 5 महीने की प्रेग्नेंट बिलकिस बानो अपनी फैमिली के साथ एक सुरक्षित जगह की तलाश में छिपी थीं। इसी दौरान हथियारों से लैस भीड़ ने उनके परिवार पर हमला कर दिया। आरोप है कि इस हमले के बाद बिलकिस के साथ गैंगरेप किया गया और उनके परिवार के 7 लोग मारे गए। दंगे में उनकी 3 साल की बेटी को भी मार दिया गया।
क्यों भड़के थे गुजरात में दंगे?
27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे को जला दिया गया था। इसमें अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों की जिंदा जलकर मौत हो गई थी। इसके बाद गुजरात में दंगे भड़क गए थे।
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बिलकिस गैंगरेप केस में ये आरोपी हुए रिहा
बिलकिस बानो गैंगरेप केस में राधेश्याम शाही, केशुभाई वदानिया, बकाभाई वदानिया, राजीवभाई सोनी, जसवंत चतुरभाई नाई, रमेशभाई चौहान, शैलेशभाई भट्ट, बिपिन चंद्र जोशी, मितेश भट्ट, गोविंदभाई नाई और प्रदीप मोढिया के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। सभी आरोपियों को 2004 में गिरफ्तार किया गया था। बाद में 21 जनवरी, 2008 को मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने 11 आरोपियों को दोषी पाया था और इन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।
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